शेखर गुप्ता का कॉलम:क्या इतिहास फिर से खुद को दोहराएगा?

May 27, 2026 - 06:10
शेखर गुप्ता का कॉलम:क्या इतिहास फिर से खुद को दोहराएगा?
इतिहास खुद को दोहराता है। आज जो कुछ हो रहा है, उस पर नजर डालें तो लगेगा 1973 में जो ऐतिहासिक संकट आया था उसकी वापसी के संकेत मिल रहे हैं। वैसे अभी इसे हम कयामत की आहट नहीं कहेंगे। कारण, पिछले 53 वर्षों में भारत काफी मजबूत हुआ है। इंदिरा गांधी ने 1971 का चुनाव भारी बहुमत से जीता था। अपने सहयोगियों सीपीआई और द्रमुक के साथ मिलकर उन्होंने कुल 80 फीसदी सीटें जीत ली थी। उसी साल उन्होंने पाकिस्तान को हराया और बांग्लादेश का जन्म हुआ। अगले साल 19 राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों में हुए चुनावों में से 15 राज्यों में उन्होंने निर्णायक जीत हासिल की थी। जिन चार राज्यों- मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, गोवा में वे चूक गईं, वे छोटे राज्य थे। मिजोरम और गोवा तो उस समय केंद्रशासित प्रदेश ही थे। इंदिरा गांधी उस समय अपनी सत्ता और गौरव के शिखर पर थीं। ऐसी चुनौतीहीन सत्ता किसी भारतीय नेता को नहीं हासिल हुई है। नरेंद्र मोदी उनकी बराबरी के करीब हैं। लेकिन हालात नाटकीय रूप से बदले। पहले, भारत में मॉनसून लगातार दो साल 1972-73 में फेल हो गया। भारत 1965-66 में भी इसे झेल चुका था। तब तक मुख्यतः कृषि प्रधान रही अर्थव्यवस्था में हरित क्रांति से हुए लाभ को इसने पोंछ दिया। 1973 में योम किप्पुर युद्ध हुआ और पश्चिम एशियाई देशों ने पहली बार तेल को हथियार के रूप में इस्तेमाल करके तेल संकट को जन्म दे दिया। तेल की कमी और बढ़ती कीमतों ने सूखे के संकट को और गहरा कर दिया। भारत के युवाओं का आक्रोश उबलने लगा, जो सबसे पहले गुजरात में फूटा। आर्थिक संकट से हर कोई प्रभावित था : बेरोजगारी, किराया और बढ़ती महंगाई। इस मामले में चिनगारी कॉलेज हॉस्टलों के मेस की फीस में वृद्धि के चलते भड़की। इसने तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के खिलाफ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का रूप ले लिया। जल्द ही बिहार में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार सरीखे छात्र नेताओं ने ‘छात्र संघर्ष समिति’ के गठन के साथ महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन खड़ा कर दिया। उन्होंने जयप्रकाश नारायण (जेपी) को आंदोलन का नेतृत्व सौंप दिया। इंदिरा गांधी ने इसके जवाब में कई तरह के कदम उठाए। चिमनभाई पटेल को हटा दिया। बिहार में अब्दुल गफूर 1974 तक तो कुर्सी पर रहे, लेकिन अप्रैल 1975 में उन्हें भी जाना पड़ा। 1974 की गर्मियों में इंदिरा गांधी ने पहला परमाणु परीक्षण, ‘पोकरण-1’ कर डाला। उन्होंने अपनी सरकार को अस्थिर करने की विदेशी ताकतों, खासकर सीआईए की साजिशों की बातें उठाईं। लेकिन वे किसी तरह से जनता का मूड नहीं बदल पाईं। मूड बदला भी नहीं जा सकता था, क्योंकि बेरोजगारी चरम पर पहुंच गई थी और 1974 में मुद्रास्फीति 29 फीसदी के आंकड़े को छू रही थी। सितंबर में यह आंकड़ा 34.68 फीसदी पर पहुंच गया था। ऐसी सुनामी को कौन उलट सकता था? ऐसे में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी, जो हमारे लोकतंत्र पर एक स्थायी धब्बे की तरह बनी हुई है, और आखिर में यह भी उन्हें नहीं बचा पाई। 1977 में एक निष्पक्ष चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। अब पिछले 18 महीने की घटनाओं पर गौर कीजिए और भविष्य पर नजर डालिए। पश्चिम एशिया में युद्ध के साथ तेल संकट एक बार फिर झटके दे रहा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक बड़े पैमाने पर बाहर जा रहे हैं। इससे 20 अरब डॉलर देश से बाहर जा चुका है। कई बड़ी भारतीय कंपनियां विदेश में निवेश कर रही हैं, जिसके कारण ‘एफडीआई’ का आंकड़ा कुलमिलाकर शून्य ही है। इस सबके कारण, विडम्बना यह है कि कमजोर पड़ते डॉलर के बावजूद रुपये पर दबाव बढ़ा है। यूपीए सरकार के आखिरी वर्षों में रुपये की ‘मजबूती’ को मुद्दा बनाकर भाजपा ने बड़ी गलती की। अब उसे यह उलटा पड़ रहा है और वह क्रिकेट के बल्लेबाज की ‘नर्वस नाइंटीज़’ वाली बेचैनी महसूस कर रही है। सरकार को डर है कि डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत कहीं 100 के आंकड़े को पार न कर जाए। लेकिन आपकी मुद्रा की सेहत तो ग्लोबल मार्केट के तर्कों और आपकी अर्थव्यवस्था के मुताबिक ही बनेगी। हमें चीन से सबक लेना चाहिए था, जिसने पहले ही समझ लिया था कि अपनी मुद्रा को कमजोर रखने में ही फायदा है। तेल ने जो झटका दिया है, वह 1973 की ही पुनरावृत्ति है। सरकार इसकी कीमतों में वृद्धि का बोझ अंततः उपभोक्ताओं पर डालेगी। मुद्रास्फीति बढ़ेगी, और बेरोजगारी और ज्यादा चुभेगी। 1973 में जो मॉनसून फेल हुआ था उसकी बात करें तो इस चेतावनी पर भी गौर करना होगा कि यह अल-नीनो वाला साल है और हम नहीं जानते यह क्या रूप लेगा। 1973 में हमारी जीडीपी में खेती का जितना बड़ा हिस्सा होता था, उसके मुकाबले आज वह काफी कम है लेकिन कृषि संकट से जितने ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं, उतने किसी और से नहीं होते। इसलिए, लोगों के मूड पर नजर रखिए। कुछ संकेत तो बिलकुल साफ हैं। नीट को लेकर विवाद इस आक्रोश को उजागर करता है। हमारी सरकार कारोबार करने की सुविधा की दुहाई देती है। लेकिन गिनती की नौकरियों या रोजगार दिलाने वाली पढ़ाई के मौकों के लिए होड़ करने की क्रूरता पर जरा गौर कीजिए। कैट, नीट, जेईई, क्लैट, यूपीएससी से लेकर एनडीए, आईएमए और अग्निवीर तक न जाने कितने कोर्स की परीक्षाओं और अब कॉलेजों में दाखिले के लिए सीयूईटी तक के कारण भारतीय युवा चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। यह पहले से ही परेशान मध्यवर्ग की जमा-पूंजी पर प्रहार कर रहा है और निम्न मध्यवर्ग को कर्ज के दलदल में फंसा रहा है। और, अंत में आप पाते हैं कि कुछ ठगों ने पूरी व्यवस्था से खेल कर दिया है, परीक्षाएं रद्द की जा रही हैं, और आपको फिर से सारी मशक्कत करनी है। कल्पना कीजिए, ये युवा कितने गुस्से में होंगे। खासकर तब जब वे पाते हैं कि सरकार का जवाब उबाऊ है कि हम उन ठगों को जेल में डाल देंगे और परीक्षा फिर से कराएंगे। लोग बार-बार दोहराए जाते इस दुष्चक्र के आगे बेबस हैं। यह आक्रोश क्या उतना ही तीखा है, जितना 1973-74 में गुजरात के कॉलेजों के मेस की बढ़ती फीस या बिहार में महंगाई के खिलाफ था? यह बता पाना मुश्किल है। लेकिन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के समर्थन में जो भारी उभार उठा है, वह कुछ संकेत जरूर देता है। युवाओं में उभरता आक्रोश... क्या आज युवाओं में उभर रहा आक्रोश उतना ही तीखा है, जितना 1973-74 में गुजरात के कॉलेजों के मेस की बढ़ती फीस या बिहार में महंगाई के खिलाफ था? यह बता पाना अभी तो खैर बहुत मुश्किल है। लेकिन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के समर्थन में जो भारी उभार उठा है, वह कुछ संकेत जरूर देता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)