शेखर गुप्ता का कॉलम:भविष्य की चुनौतियों को नजरअंदाज ना करें

Jun 17, 2026 - 06:08
शेखर गुप्ता का कॉलम:भविष्य की चुनौतियों को नजरअंदाज ना करें
बीते दिनों यह चर्चा बहुत छाई रही कि नरेंद्र मोदी ने सबसे लंबे समय तक भारत के निर्वाचित प्रधानमंत्री बने रहने का जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। मोदी और नेहरू के बीच खूब तुलना की जा रही है कि देश के लिए किसने ज्यादा काम किया। लेकिन बेहतर यह होगा कि अब तक जो कुछ किया गया है, उसकी बजाय हम भविष्य की ओर देखें। क्योंकि मोदी का काम अभी खत्म नहीं हुआ है। उनके इस कार्यकाल के अभी तीन साल बाकी हैं और वे 2029 में भी उम्मीदवार रहेंगे। यह पक्की बात है। और क्या पता, 2034 में भी रहें! इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले किसी प्रधानमंत्री की तरह मोदी को भी संकटों का सामना करना पड़ा है। तीन संकट वैश्विक थे : कोविड, यूक्रेन और पश्चिम एशिया में जंग। उनके लिए एक और चुनौती यह है कि ट्रम्प के बाकी बचे कार्यकाल से किस तरह निबटा जाए। अब तक मोदी समभाव से उनका सामना करते रहे हैं। वे अमेरिका के मित्र-देशों से संकेत लेते हुए शांत रहने और किसी उकसावे में न आने की नीति अपनाते रहे हैं। आगे लेनदेन वाला पहलू प्रमुख होता जाएगा। भारत इसे संभाल सकता है। पश्चिम एशिया में जंग ने साफ कर दिया है कि भारत ने एक पक्ष को चुन लिया है, वह है : इजराइल, अमेरिका और यूएई। इसे वह खुलकर कभी नहीं कहेगा लेकिन उसके कदम यह जाहिर कर देते हैं। अमेरिका के साथ अंतरिम व्यापार समझौता कभी भी हो सकता है, व्यापारिक रिश्ते और व्यापार भारत के कॉर्पोरेट नेताओं के सक्रिय समर्थन से जारी रहेंगे। आम तौर पर आप यह मान कर चल सकते हैं कि ट्रम्प चाहे जितना उकसाएं, मोदी के आलोचक चाहे जितना तंज कसें, मोदी उकसावे में नहीं आने वाले। लेकिन बड़ा संकट कभी-न-कभी उभर सकता है। आखिर पाकिस्तानियों ने ट्रम्प के लिए इतना कुछ किया है कि वे केवल अपने फील्ड मार्शल की तारीफों से संतुष्ट नहीं होने वाले हैं। वे इनाम के रूप में यह भी चाह सकते हैं कि अमेरिका कश्मीर मसले का जिक्र करे- अस्पष्ट रूप से ही सही, ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट के रूप में ही सही। फील्ड मार्शल की अर्थव्यवस्था भारी संकट में है और उनके पश्चिमी मोर्चे पर आग लगी हुई है। उन्हें इस सबसे छुटकारा पाने की जरूरत है। मुनीर को यह छुटकारा कश्मीर मसले के फिर से उभार में नजर आ सकता है। मोदी इस चुनौती से कैसे निबटेंगे? उससे निबटने का समय आ गया है। इसके लिए करीब ढाई वर्षों तक रणनीतिक धैर्य बनाए रखना होगा। इस धैर्य को उचित ठहराने, और इसे बनाए रखने के लिए भी सामरिक (सैन्य) ताकत चाहिए। मोदी अगर अपने पिछले 12 वर्षों पर नजर डालें, और थोड़े समय के लिए नेहरू और 1962 को भूल जाएं, तो उन्हें मानना पड़ेगा कि उन्होंने डिफेंस पर पर्याप्त खर्च नहीं किया है। जो पैसा उपलब्ध था, उसे भी अधिग्रहण वाली पाइपलाइन में लगी जिद्दी जंग के कारण पूरा खर्च नहीं किया जा सका। कई जंग अभी भी मौजूद हैं। कई सुधार लागू होने वाले हैं, खासकर निजी क्षेत्र के लिए दरवाजा खोलने वाले, लेकिन उनके नतीजे दिखने में समय लगेगा। तब तक तत्काल कार्रवाई करने की तैयारी दिखनी चाहिए, क्योंकि मुनीर कभी भी हमलावर हो सकते हैं। इसके लिए छह महीने, दो साल और पांच साल की दीर्घकालिक योजनाएं चाहिए। अर्थव्यवस्था ही सभी रणनीतिक और सामरिक ताकतों का आधार-स्तम्भ है। भारत लंबे समय से इस सुकून में डूबा रहा है कि वह तो सबसे तेजी से वृद्धि कर रही बड़ी अर्थव्यवस्था है। इतनी बड़ी आबादी वाला जो देश प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया में 144वें से लेकर 149वें स्थान के बीच झूल रहा हो, उसके लिए यही काफी नहीं है। भारत को इससे बेहतर प्रदर्शन करना चाहिए। प्रधानमंत्री को ‘न्यूनतम सरकार’ का अपना वादा और महामारी के दौरान दिए गए अपने उस बयान को भी याद करना चाहिए कि ‘बिजनेस में रहना सरकार का बिजनेस नहीं है’, कि सरकार कुछ रणनीतिक मामलों को छोड़ सभी क्षेत्रों से बाहर हो जाएगी। लेकिन बीते वर्षों में इसका उलटा ही होता रहा है। उलटे कई नए पीएसयू (सरकारी उपक्रम) बनाए जा चुके हैं। जब भी यह सरकार संकट में पड़ी है, उसने अपने गलत कदमों को वापस लेने की क्षमता दिखाई है। यह क्षमता कई ‘एफटीए’ (मुक्त व्यापार समझौतों), बॉन्डों में विदेशी निवेश पर टैक्स वापस लेने और अब एक नई, उदार ‘बीआईटी’ (द्विपक्षीय निवेश संधि) की (पिछली सभी संधियों के रद्द होने के बाद) चर्चाओं से उजागर होती है। कोई सरकार संकट से सबक लेकर अपनी नीतियों को इतने नाटकीय रूप से बदलने की तैयारी दिखाती है तो यह अच्छा संकेत है। लेकिन भारत को ऐसे कई कदमों की जरूरत है। मसलन खनन, हाइड्रोकार्बन की खोज, शहरीकरण, छतों पर सोलर पैनल जैसे सरल मामलों में। इस मामले में तो पाकिस्तान भी हमसे आगे है। यह बात उस ‘पीएम सूर्य घर योजना’ को बढ़ावा देने के लिए काफी होनी चाहिए थी, जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री ने फरवरी 2024 में की थी। हिंदुत्व के साथ मिलकर वृद्धि दर फिर भी चुनाव जिता सकती है। लेकिन यह भारत द्वारा क्षमता से कमतर प्रदर्शन होगा। इस सूची में अंतिम चुनौती राजनीतिक ही होनी चाहिए। मोदी-शाह की जोड़ी ने लोकसभा में 240 सीटों के अल्पमत के साथ शुरू करके उल्लेखनीय तेजी दिखाई है और भारत को लगभग एक-दलीय व्यवस्था में तब्दील करने में सफलता हासिल की है। लेकिन राजनीति में स्थिरता नहीं रहती। इसमें से अधिकांश ताकत नये सहयोगियों के कंधों की सवारी करके या कई छोटी पार्टियों में टूट-फूट पैदा करके हासिल की गई है। ऐसा भी कभी हो सकता है कि किसी सहयोगी का धैर्य जवाब दे जाए, राज्यों की राजधानियों में जिन ‘प्रतिभाओं’ को गद्दी सौंपी गई है उनके कारण कोई मुख्यमंत्री कोई बड़ा संकट खड़ा कर दे। और, भाजपा में अभी ‘उत्तराधिकारी’ शब्द का उच्चारण कोई भले न करे, लेकिन 2029 करीब आते ही पार्टी के अंदर एक तरह की ‘प्राइमरी’ (पूर्व चयन) की आवाज उठ सकती है। 2034 में पचास से साठ के बीच की उम्र के कम-से-कम चार ऐसे नेता होंगे, जो उस समय दावेदार हो सकते हैं। विपक्ष की आज जो हालत है, उसके कारण भाजपा के लिए कोई राजनीतिक चुनौती अंदर से ही उभर सकती है। वर्तमान से बेहतर प्रदर्शन... कई सुधार लागू होने वाले हैं, खासकर निजी क्षेत्र के लिए दरवाजा खोलने वाले, लेकिन उनके नतीजे दिखने में समय लगेगा। इसके लिए हमें दीर्घकालिक योजनाएं चाहिए। अर्थव्यवस्था ही सभी रणनीतिक और सामरिक ताकतों का आधार-स्तम्भ होती है। ऐसे में हमें वर्तमान से बेहतर प्रदर्शन करना चाहिए। (ये लेखक के अपने विचार हैं)