संजय कुमार का कॉलम:राज्यों में क्षेत्रीय दल अपना जनाधार कायम रखे हुए हैं
बंगाल में टीएमसी की हार और उसके बाद कई दलों में हुए दलबदल ने क्षेत्रीय दलों की प्रासंगिकता को लेकर सवाल खड़े कर दिए थे। यह सच है कि इस समय क्षेत्रीय दल संकट का सामना कर रहे हैं, लेकिन उनके महत्व को समाप्त मान लेना अभी जल्दबाजी होगी। बंगाल में टीएमसी या दिल्ली में आप जैसे दलों की हार को क्षेत्रीय दलों के स्थायी पतन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। पिछले चार लोकसभा चुनावों के साथ-साथ विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के वोट शेयर में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि वोट शेयर किसी दल के अंतर्निहित जनाधार का सबसे बेहतर इंडिकेटर होते हैं। इसके अलावा मतदाता लोकसभा चुनावों की तुलना में विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों को अधिक प्राथमिकता देते हैं। यह स्थानीय राजनीतिक पहचानों के महत्व को रेखांकित करता है। बंगाल में हार के बाद टीएमसी को कई विधायकों और सांसदों के दलबदल का सामना करना पड़ा। आप के राज्यसभा सांसदों के बीच भी बड़े पैमाने पर दलबदल हुआ। महाराष्ट्र में एनसीपी (एसपी) के सांसदों ने भी पाला बदला। ये घटनाक्रम संगठनात्मक कमजोरियों की ओर जरूर संकेत करते हैं, लेकिन इसे जनसमर्थन के घटने का संकेत नहीं माना जा सकता। फिलहाल, 11 राज्यों में भाजपा की सरकार है, जबकि कांग्रेस की सरकारें 3 राज्यों में हैं। क्षेत्रीय दल 4 राज्यों में सरकार चला रहे हैं। इसके अलावा, 10 अन्य राज्यों-यूटी में भाजपा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकारें सत्ता में हैं। इनमें से 4 में क्षेत्रीय दल गठबंधन के प्रमुख साझेदार हैं, जबकि भाजपा की भूमिका सहयोगी की है। ये हैं- आंध्र प्रदेश, मेघालय, नगालैंड और पुडुचेरी। शेष 6 में भाजपा क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करके सरकार का नेतृत्व कर रही है। इनमें बिहार, यूपी, असम, गोवा, महाराष्ट्र और त्रिपुरा शामिल हैं। 3 राज्यों में कांग्रेस भी क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन सरकार का हिस्सा है। झारखंड में कांग्रेस झामुमो की कनिष्ठ गठबंधन सहयोगी है और जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस की। केरल में कांग्रेस अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही है। पिछले चार लोकसभा चुनावों के दौरान विभिन्न दलों को मिले वोटों के विश्लेषण से पता चलता है कि इस अवधि में राष्ट्रीय दलों का संयुक्त वोट शेयर 60.04% से 68.15% के बीच रहा है। यानी उनका समग्र चुनावी समर्थन अपेक्षाकृत स्थिर रहा है। राष्ट्रीय दलों का सबसे कम संयुक्त वोट शेयर 2014 के लोकसभा चुनाव में दर्ज किया गया, जब उन्हें कुल मतों का 60.04% मिला था। वहीं सबसे अधिक 68.15% वोट उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में मिले थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि 2014 का चुनाव दिखाता है कि भारत की ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ चुनाव प्रणाली में वोट शेयर और चुनावी नतीजे हमेशा एक-दूसरे के अनुरूप नहीं होते। पिछले चार लोकसभा चुनावों में 2014 में राष्ट्रीय दलों का संयुक्त वोट शेयर सबसे कम रहने के बावजूद भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने निर्णायक बहुमत हासिल किया था और केंद्र में सरकार बनाई थी। 2009 के लोकसभा चुनाव में सभी राष्ट्रीय दलों को मिलाकर 63.59% वोट मिले थे, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में सभी राष्ट्रीय दलों का संयुक्त वोट शेयर 62.72% रहा। इससे संकेत मिलता है कि चुनावी राजनीति में उनकी समग्र उपस्थिति व्यापक रूप से स्थिर बनी हुई है। दूसरी ओर, क्षेत्रीय दलों ने लोकसभा चुनावों में लगातार करीब एक-तिहाई वोट हासिल किए हैं, हालांकि अलग-अलग चुनावों में इसमें कुछ उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। 2009 के लोकसभा चुनाव में सभी क्षेत्रीय दलों को मिलाकर 31.22% वोट मिले थे, जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों का संयुक्त वोट-शेयर 35.86% रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी सभी क्षेत्रीय दलों को मिलाकर 33.52% वोट मिले। एकमात्र अपवाद 2019 का चुनाव रहा, जब क्षेत्रीय दलों का संयुक्त वोट शेयर 28.1% था। ये आंकड़े संकेत देते हैं कि कुछ राज्यों में चुनावी झटकों के बावजूद क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय स्तर पर और कई राज्यों में अपना पर्याप्त जनाधार बनाए हुए हैं। उनके चुनावी प्रदर्शन में उतार-चढ़ाव आ सकता है, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तमिलनाडु में डीएमके को नुकसान हुआ तो उसकी जगह किसी राष्ट्रीय दल ने नहीं, बल्कि एक अन्य क्षेत्रीय दल टीवीके ने ले ली। इससे पता चलता है कि कई राज्यों में चुनावी प्रतिस्पर्धा का स्वरूप अब भी मुख्य रूप से क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों से ही तय होता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)