हार्वर्ड के एक्सपर्ट ने कहा-ज्यादा पैसा खुशी की गारंटी नहीं:अपनों को दूर कर अकेला कर देता है, ईमानदारी और भरोसा तो सच्चे रिश्तों में ही
ज्यादातर लोगों को लगता है कि बैंक बैलेंस बढ़ते ही आधी से ज्यादा मानसिक परेशानियां खत्म हो जाएंगी। एक हद तक यह सच भी है। पैसा स्थिरता देता है, घर, इलाज व बुढ़ापे की चिंताओं से मुक्ति दिलाता है। पर क्या असीमित दौलत वाकई खुशी की गारंटी है...? दुनिया के सबसे अमीर परिवारों को दी जाने वाली ‘कंसीर्ज मेंटल-हेल्थ सर्विसेज’ एक्सपर्ट मानते हैं... जरूरत से ज्यादा पैसा रिश्तों व मानसिक सेहत के लिए अदृश्य खतरा बन जाता है। धन व सफलता की अंधी दौड़ रिश्ते कैसे खोखले करती है, जानिए... हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट एसोसिएट प्रोफेसर डेविड एच रोजमारिन का कहना है- ‘अमेरिका के रईस पेरेंट्स ने बेटे के जुए का कर्ज चुकाने में लाखों डॉलर बहा दिए। पैसे की इस सुलभता ने कड़वे सच को टाल दिया, जिससे बेटे की लत और गहरी हो गई और अंततः वह परिवार से अलग हो गया। वहीं, दूसरे मामले में, एक छात्रा गंभीर डिप्रेशन का शिकार हुई। तकलीफ बताने पर पेरेंट्स ने उसे आलीशान जिंदगी व खासे निवेश की याद दिलाई। खुद को ‘सुनहरे पिंजरे’ में महसूस कर वह चुप रही, जिससे स्थिति आत्मघाती मोड़ तक पहुंच गई। इन मामलों से समझ सकते हैं कि ज्यादा पैसा मानसिक चुनौतियों को जटिल बना देता है। शुरुआत में रईसों की आलीशान जिंदगी चकाचौंध करती है, पर जल्द ही पीछे छिपा अकेलापन, कलह व अवसाद सामने आ जाता है। दरअसल, असीमित पैसा होने पर रिश्तों को मजबूत बनाने वाले बुनियादी अनुभव- जैसे समझौता, तालमेल, जवाबदेही व त्याग गायब हो जाते हैं। आपसी निर्भरता खत्म होने से रिश्ते भावनात्मक जुड़ाव के बजाय ‘लेन-देन’ पर टिक जाते हैं। नतीजा यह होता है कि अरबों की संपत्ति के बीच भी लोग भीतर से अकेले हो जाते हैं। अमीर परिवारों में पैसा पेन किलर की तरह काम करता है। जीवन में कोई तनाव, दुख या अवसाद आता है, तो रईस लोग उसे महसूस करने व सामना करने के बजाय महंगे दौरों, नई संपत्तियों या थेरेपी के आलीशान इंतजामों से तुरंत ‘सुन्न’ कर देते हैं। इससे उनकी दुख सहने व उनसे उबरने की स्वाभाविक मानसिक क्षमता खत्म हो जाती है। ज्यादा पैसा व्यक्ति के भीतर गहरा संदेह पैदा करता है कि ‘लोग मुझसे प्यार करते हैं या मेरे पैसे से?’ यह संदेह मानसिक बीमारी का रूप ले लेता है। इससे कई बार जीवनसाथी, दोस्तों...यहां तक कि बच्चों पर भी भरोसा नहीं कर पाते। उनके रिश्ते हमेशा अनजाने डर व तनाव के साए में रहते हैं। इन लोगों का आत्म-सम्मान अक्सर बैंक बैलेंस व सामाजिक रुतबे पर टिका होता है, न कि इंसानी गुणों पर। यही स्थिति उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बना देती है। बाजार में हल्का उतार-चढ़ाव भी उन्हें डिप्रेशन और पैनिक अटैक की ओर धकेल देता है। मानसिक सुख का रहस्य आम परिवारों में मुश्किलें लोगों को आपस में निर्भर रहना सिखाती हैं। वे असहज पलों से भागने के बजाय आपस में लड़कर, समझौता करके भरोसा व नजदीकियां बुनते हैं। पर पैसा इन सारे जरूरी संघर्षों को ‘स्मूथ’ कर देता है। पैसे से किसी को भी नियंत्रित कर सकते हैं, पर ईमानदारी, माफी और प्यार जैसी चीजें खरीदी नहीं जा सकतीं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की 80 साल चली स्टडी बताती है कि मजबूत सामाजिक और रिश्ते ही इंसान को खुशहाल और लंबा जीवन देते हैं, न कि पैसा। मेरा मानना है कि पैसा मौके दे सकता है, तनाव घटा सकता है, पर यह ईमानदारी, अपनेपन, जवाबदेही या प्यार का विकल्प नहीं हो सकता। मानसिक सुख के लिए बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि सच्चे रिश्ते मायने रखते हैं।