चेतन भगत का कॉलम:सिविक-सेंस सुधारे बिना हम विकसित नहीं कहला सकते
इंटरनेट पर ‘डु इंडियंस लैक सिविक-सेंस’ खोजकर देखिए और आप चकित रह जाएंगे। ऐसे कंटेंट की भरमार है, जिसमें लोग हमारे नागरिकता-बोध पर खेद जताते नजर आते हैं। बात सड़कों, पर्यटन स्थलों, हिल स्टेशनों पर कूड़ा फेंकने तक ही सीमित नहीं है, दुनिया के प्रमुख पर्यटन स्थलों- जैसे बुर्ज खलीफा, एफिल टावर या वियतनाम की ट्रेन-स्ट्रीट पर भारतीयों द्वारा नाचने, ट्रेनों में गंदगी करने, कतार तोड़ने और जरूरतमंद लोगों के लिए उपलब्ध सुविधाओं का दुरुपयोग करने की भी शिकायतें अब आम होने लगी हैं। एक भारतीय के रूप में यह सब देखना और पढ़ना लज्जास्पद लगता है। इससे विदेशों में हमारी छवि पर बट्टा लगता है। ऐसी खबरें भी आती हैं कि विदेशी होटलों में भारतीयों को व्यवहार संबंधी विशेष निर्देश दिए जाने लगे हैं। हमें इसे सुधारना होगा। हम सभी ने अपने साथी नागरिकों में सिविक-सेंस की कमी को देखा भी है और उसका खामियाजा भी भुगता है। भारतीय सड़कें इस बात का क्लासिक उदाहरण हैं कि हम दूसरों के हितों के प्रति कितने उदासीन हैं। जबकि सिविक-सेंस की परिभाषा ही यह है कि व्यक्ति इस तरह व्यवहार करे कि उसे एहसास हो सार्वजनिक स्थान और व्यवस्थाएं केवल उसके ही नहीं, सभी के लिए हैं। एक समाज के रूप में हम ऐसा क्यों सोचते हैं कि हमें जो कुछ मिल सकता है, उसे छीन या झपट लेना चाहिए, फिर बाकी लोगों का चाहे जो हो। शायद यह एक कठोर माहौल में जीने का परिणाम है, जहां संसाधन सीमित हैं, नियमों को लचीला समझा जाता है, ताकत की तूती बोलती है और यह मान लिया गया है कि हर व्यक्ति अपने ही भरोसे है। सड़कों पर कचरा फेंकना, ट्रैफिक सिग्नल तोड़ना, सार्वजनिक जगहों पर थूकना, देर रात तक तेज आवाज में संगीत बजाना, कतार तोड़ना, अवैध पार्किंग करना और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना : क्या ये बातें जानी-पहचानी लगती हैं? मुझे यकीन है कि लगती होंगी, क्योंकि हमने अपने आसपास पूरी जिंदगी यही सब देखा है। क्या सभी भारतीयों में सिविक-सेंस की कमी है? ऐसा सामान्यीकरण तो गलत होगा। बहुसंख्य भारतीय ऐसे भी हैं, जो अच्छा व्यवहार करते हैं। लेकिन वायरल रीलों के दौर में बुरी चीजें बार-बार देखी और साझा की जाती हैं, जिससे धारणा बन जाती है कि सभी ऐसे हैं। इसे कैसे ठीक करें? क्या यह केवल खराब शिक्षा और सख्त नियमों की कमी का मामला है? क्या एनसीईआरटी की किताबों के जरिए बच्चों को कूड़ा न फैलाने की शिक्षा देने और यूरोप की तर्ज पर भारी-भरकम ट्रैफिक जुर्माना लगाने भर से यह ठीक हो जाएगा? दुर्भाग्य से, समाधान इतना सरल नहीं है। यकीन मानिए, टोक्यो, सिंगापुर और सियोल जैसे शहर- जो आज बेहतरीन सिविक-सेंस के उदाहरण हैं- दशकों पहले इसी तरह की समस्याओं से जूझते थे। उन्होंने इसे कैसे ठीक किया, यह जानने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि सिविक-सेंस का ह्रास कैसे होता है। आम तौर पर इसकी चार स्थितियां होती हैं। पहली, बुनियादी ढांचे का अभाव। दूसरी, नियमों में ढील। तीसरी, अत्यधिक घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्र, जहां व्यवस्था पर जरूरत से ज्यादा दबाव पड़ता है। और चौथी, तेजी से होता शहरीकरण, जिसके चलते लोग लगातार बड़े शहरों में आते तो हैं, लेकिन वहां अपनाए जाने वाले व्यवहार और नियमों की उन्हें समझ नहीं होती। ये तमाम परिस्थितियां भारत में मौजूद हैं। भारत में लाल बत्ती पार करने वालों में से कितनों पर जुर्माना लगाया जाता है? कैमरों की मदद से ऐसा किया जा सकता है और इससे सरकार को राजस्व भी मिलेगा। कूड़ा फैलाने वालों में से कितनों से हर्जाना वसूला जाता है? हर्जाने की राशि भले कम हो, लेकिन इसका अनिवार्य होना जरूरी है। भारत के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर से सीखें। वहां स्थिति यह हो गई है कि नागरिकों के लिए अपने शहर को साफ रखना गर्व की बात बन गई है। दूसरे शहर भी ऐसा कर सकते हैं। याद रखें कोई देश तब तक विकसित नहीं कहला सकता, जब तक उसके नागरिकों में सिविक-सेंस न हो और वे अपने पब्लिक-स्पेसेस को साफ-सुथरा न रख सकें। हमारे यहां तो उलटे बेतरतीबी और जुगाड़ को महिमामंडित किया जाता है, लेकिन ये विकास के इंडिकेटर नहीं हो सकते। भारत में लाल बत्ती पार करने वालों में से कितनों पर जुर्माना लगाया जाता है? कूड़ा फैलाने वालों में से कितनों से हर्जाना वसूला जाता है? जुर्माने और हर्जाने की राशि भले कम हो, लेकिन इनका अनिवार्य होना जरूरी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)