डॉ. राम चरण का कॉलम:आत्मविश्वास जरूरी पर इसे भी लगातार ‘रिन्यू’ करना होता है

May 23, 2026 - 06:05
डॉ. राम चरण का कॉलम:आत्मविश्वास जरूरी पर इसे भी लगातार ‘रिन्यू’ करना होता है
दुनिया में छह दशकों तक सीईओ और निदेशक मंडलों को परामर्श देने के दौरान मैंने लगातार एक ऐसी विशेषता देखी है, जो ग्रेट लीडर्स को गुड लीडर्स से अलग करती है। वह बुद्धिमत्ता नहीं है। रणनीति नहीं है। वह केवल अनुभव भी नहीं है। वह है- आत्मविश्वास। अहंकार नहीं। दिखावटी दु:साहस नहीं। आत्मविश्वास। आत्मविश्वास हमारी ‘बीइंग’ की एक दशा है। यह अपनी क्षमताओं की गहरी समझ और उस परिवेश की स्पष्ट पहचान से उत्पन्न होता है, जिसमें व्यक्ति काम करता है। यह वह आश्वस्ति है, जो अपनी शक्तियों को स्पष्ट रूप से जानने और अपनी सीमाओं को ईमानदारी से स्वीकारने से आती है। और यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपकी सीमाओं को आपकी राह का अवरोध नहीं बनना चाहिए। उन्हें आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। कई लीडर्स आत्मविश्वास को निश्चितता समझने की भूल करते हैं। दोनों एक नहीं हैं। निश्चितता कहती है : मुझे ठीक-ठीक पता है क्या होने वाला है। आत्मविश्वास कहता है : मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि क्या होने वाला है, लेकिन मुझे यह विश्वास है कि मैं उसका सामना करने और उसे हैंडल करने की क्षमता रखता हूं। आज की दुनिया में यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। वास्तविक आत्मविश्वास का निर्माण करने वाली तीन बातें हैं। पहली, ज्ञान और विशेषज्ञता। जब आप अपने क्षेत्र को गहराई और विशिष्टता के साथ वास्तव में समझते हैं, तब आपको आत्मविश्वास का प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वह स्वाभाविक रूप से उपस्थित होता है। तैयारी ही आत्म-आश्वस्ति की नींव है। जिस लीडर ने जमकर काम किया है, उसे दिखावा करने की जरूरत नहीं होती। दूसरी, अनुभव और उससे प्राप्त सीख। हर चुनौती जिसका आप सामना करते हैं, हर झटका जिसे आप सहते हैं, हर निर्णय जो आप दबाव में लेते हैं- यह सब आपकी नींव को मजबूत करता है। जिसने कठिनाइयों का सामना किया है और उनसे निकलकर आगे बढ़ा है, उसके आत्मविश्वास की प्रकृति उस व्यक्ति से बिल्कुल अलग होती है, जिसने केवल सहज परिस्थितियां ही देखी हों। अपने कठिन क्षणों को व्यर्थ मत जाने दीजिए। उनसे अपने लिए कुछ सीख भी हासिल कीजिए। तीसरी, आत्म-जागरूकता। यह जानिए कि आप किस चीज में अच्छे हैं। यह भी जानिए कि किन क्षेत्रों में आपको दूसरों की आवश्यकता है। जो लीडर यह दिखावा करता है कि उसमें कोई कमजोरी नहीं है, वह किसी को धोखे में तो नहीं रख पाता, लेकिन स्वयं भी कुछ सीख नहीं पाता है। जो लीडर अपनी शक्तियों और सीमाओं दोनों को स्पष्ट रूप से देखता है, उसी का आत्मविश्वास सबसे स्थायी होता है। एक और बात याद रखें : आत्मविश्वास स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील होता है। यही वह बात है जिसे बहुत से लोग समझ नहीं पाते। आत्मविश्वास ऐसी चीज नहीं है, जिसे एक बार हासिल कर लेने के बाद हमेशा के लिए अपने पास रखा जा सके। यह गतिशील है। इसे आपके साथ निरंतर विकसित होना पड़ता है। दुनिया जिस गति से बदल रही है, उसका इतिहास में कोई उदाहरण नहीं मिलता। नई तकनीकें, नई भू-राजनीतिक वास्तविकताएं और नए व्यावसायिक मॉडल लगातार उभर रहे हैं। आज के आत्मविश्वासी लीडर को इसके लिए तैयार रहना होगा कि वो जो काम कल करता था, उसे भूल सके; जो आज सत्य है, उसे आत्मसात कर सके; और जो कल आवश्यक होगा, उसके लिए अपनी क्षमता विकसित कर सके। इसका अर्थ है कि आत्मविश्वास को निरंतर रिन्यू करना पड़ता है- लगातार सीखते हुए, ईमानदार आत्ममंथन करते हुए, और यह कहने के साहस के जरिए कि : मैं गलत था और अब मैं यह समझ पाया हूं। जब कोई लीडर वास्तविक आत्मविश्वास के साथ किसी कमरे में प्रवेश करता है, तो कुछ बदल जाता है। टीम इस बात को महसूस करती है। निर्णय अधिक स्पष्ट हो जाते हैं। जोखिम मैनेज करने योग्य लगने लगता है। इनोवेशन संभव हो जाता है। एक आत्मविश्वासी लीडर दूसरों के आत्मविश्वास को दबाता नहीं; उसे बढ़ाता है। हर शाम स्वयं से तीन प्रश्न पूछिए। आज मैंने क्या अच्छा किया? आज मैंने क्या सीखा? और मैं क्या अलग तरीके से कर सकता था? यह साधारण-सी आदत यदि निरंतर अपनाई जाए, तो उस आत्म-जागरूकता का निर्माण करती है, जो वास्तविक आत्मविश्वास की बुनियाद है। यह न तो नाटकीय है, न ही जटिल। लेकिन यदि इसे ईमानदारी और निरंतरता के साथ अपनाया जाए, तो यह आपके स्वयं को देखने के तरीके और दूसरों के आपको देखने के तरीके- दोनों को बदल देती है। आत्मविश्वास स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील होता है। यह बात बहुत लोग समझ नहीं पाते। यह ऐसी चीज नहीं है, जिसे हासिल कर लेने के बाद हमेशा के लिए पास रखा जा सके। इसे आपके साथ निरंतर विकसित होना पड़ता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)