राजदीप सरदेसाई का कॉलम:देश में युवाओं का बढ़ता आक्रोश हमें कुछ बताता है

May 29, 2026 - 06:10
राजदीप सरदेसाई का कॉलम:देश में युवाओं का बढ़ता आक्रोश हमें कुछ बताता है
आज सब तरफ कॉकरोच शब्द की चर्चा है। किन्तु इसके हमारे राजनीतिक शब्दकोश का हिस्सा बनने से बहुत पहले ही मैं इस शब्द का उपयोग करता आ रहा हूं। ईश्वर न करे, लेकिन कल किसी परमाणु विस्फोट में दुनिया नष्ट हो जाए, तब भी केवल कॉकरोच ही जीवित बचेंगे। एक ग्रेट-सर्वाइवर से राजनीतिक प्रतिरोध के प्रतीक तक, कॉकरोचों ने एक लंबी यात्रा तय की है। कॉकरोच जनता पार्टी या सीजेपी का उदय उस व्यवस्था के प्रति बढ़ते जनाक्रोश को दर्शाता है, जो इतनी खण्डित हो चुकी है कि प्रदर्शनकारियों को लोकतंत्र पर मंडराते खतरों की ओर संकेत करने के लिए एक कीड़े की छवि का सहारा लेना पड़ा है। हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जिसमें नेतागण सम्राटों की तरह व्यवहार करने लगे हैं और विपक्ष कोई विश्वसनीय चुनौती पेश नहीं कर पा रहा है। इसी शून्य में कॉकरोच रेंगता हुआ प्रवेश करता है- एक ऐसा प्राणी, जिससे हमें घृणा करना और डरना सिखाया गया है, फिर भी जो हर तरह की विपत्ति के बीच जीवित रहने की क्षमता रखता है। यह तथ्य कि एक अपेक्षाकृत अनजान पोलिटिकल कम्युनिकेशन स्ट्रैटेजिस्ट द्वारा किसी अमेरिकी विश्वविद्यालय में बैठकर शुरू किया गया एक व्यंग्यात्मक आंदोलन अचानक सत्ता गलियारों में बेचैनी पैदा कर दे, अपने आप में बहुत कुछ बताता है। आखिर एक शक्तिशाली राष्ट्र को मुख्य न्यायाधीश की गैर-जरूरी टिप्पणी से उपजे ऑनलाइन-आंदोलन से चिंतित क्यों होना चाहिए? भारत के बेरोजगार युवाओं का मानो उपहास करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने अनजाने में एक तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दे दिया : क्रोध, अलगाव और व्यंग्य से संचालित एक डिजिटल विद्रोह। तब से लाखों युवा भारतीय इसके इर्द-गिर्द एकजुट हो चुके हैं। इस पूरी घटना को विशेष रूप से दिलचस्प बनाने वाली बात यह है कि सीजेपी वास्तव में कोई राजनीतिक दल नहीं है। उसका न कोई नेता है, न कार्यालय, न कार्यकर्ता-तंत्र, न कोई संगठनात्मक ढांचा। 1.5 अरब की आबादी और असाधारण विविधता वाले इस देश में केवल साइबर-स्पेस में मौजूद एक आंदोलन को सिद्धांततः यथास्थिति के लिए खतरा नहीं होना चाहिए। फिर भी खतरा क्यों महसूस किया जा रहा है? सीजेपी पर विदेशी फंडिंग से संचालित होने का आरोप लगाया जा रहा है। झूठा दावा किया जा रहा है कि उसके अनेक समर्थक पाकिस्तानी हैं। उसके सोशल मीडिया हैंडल्स को ब्लॉक किया जा रहा है। कुछ लोगों ने तो उसे आम आदमी पार्टी का प्रॉक्सी सिद्ध करने की भी कोशिश की। यह सब एक प्रकार की संशयग्रस्त मानसिकता को उजागर करता है। इस घबराहट के पीछे कई कारण हैं। अव्वल तो यही कि यह काफी हद तक नैरेटिव को कंट्रोल करने का दौर है। इस दौर का राजकाज चौबीसों घंटे चलने वाले किसी विज्ञापन-अभियान जैसा प्रतीत होता है : उपलब्धियों का प्रचार करो, विफलताओं को दबा दो, नारे बदलो और आगे बढ़ जाओ। करोड़ों नौकरियां जिनका वादा किया गया था नहीं मिलीं, किसानों की आय दोगुनी नहीं हुई, पेपर लीक लगातार जारी हैं- लेकिन नैरेटिव-प्रबंधन यह सुनिश्चित करता है कि आम धारणा, प्रदर्शन पर भारी पड़े। ऐसे में यह चीज परेशान करने वाली लग सकती है कि इंटरनेट के ये कॉकरोच किसी लिखी हुई पटकथा का पालन करने से इंकार कर रहे हैं। दूसरे, युवाओं का आक्रोश चुनावी दृष्टि से महत्व रखता है। ऊंची जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों और उग्र राष्ट्रवाद के शोर के पीछे एक ऐसी पीढ़ी मौजूद है, जो गहरी असुरक्षा से जूझ रही है। लाखों शिक्षित युवा रोजगार के घटते अवसरों, परीक्षाओं के बढ़ते दबावों और ऐसी अर्थव्यवस्था का सामना कर रहे हैं, जहां स्थायी नौकरी पाना लगातार दूर की कौड़ी बनता जा रहा है। बहुतों के लिए यह निराशा अब चिरस्थायी हो चुकी है। उन्हें लगता है कि राजनेता उन्हें केवल चुनावों के समय ही देखते हैं और केवल तभी सुनते हैं, जब वे विरोध-प्रदर्शन करते हैं। यह आक्रोश केवल वैचारिक ही नहीं है, यह कई मायनों में व्यक्तिगत भी है। यह हालिया चुनावों में भी स्पष्ट दिखाई दिया, विशेषकर तमिलनाडु में, जहां विजय की लोकप्रियता ने पारम्परिक राजनीति से तंग आ चुके युवा मतदाताओं को बड़े पैमाने पर आकर्षित किया। पूरे भारत में युवा मतदाता अब पुराने और जड़ राजनीतिक विचारों को लगातार अस्वीकार कर रहे हैं। वे ताजगी, प्रामाणिकता और भावनात्मक जुड़ाव की तलाश में हैं। मीम-संस्कृति उनके प्रतिरोध की भाषा बन चुकी है। और याद रहे कि व्यंग्य हमेशा राजनीतिक हथियार साबित होता है। अधिनायकवादी व्यवस्थाएं हास्य-व्यंग्य के सामने खुद को आश्चर्यजनक रूप से असुरक्षित ही पाती हैं। पूरे भारत में ही युवा मतदाता अब पुराने और जड़ राजनीतिक विचारों को लगातार अस्वीकार कर रहे हैं। वे ताजगी, प्रामाणिकता और भावनात्मक जुड़ाव की तलाश में हैं। मीम-संस्कृति उनके प्रतिरोध की भाषा बनती जा रही है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)