सैयद अता हसनैन का कॉलम:युद्धों को शुरू करना आसान है, लेकिन खत्म करना मुश्किल

Jun 2, 2026 - 06:06
सैयद अता हसनैन का कॉलम:युद्धों को शुरू करना आसान है, लेकिन खत्म करना मुश्किल
संघर्षों की शब्दावली अब काफी बदल गई है। रणनीतिक विमर्श में हाइब्रिड, अन-रेस्ट्रिक्टेड और कॉग्निटिव वारफेयर जैसे शब्द खूब चलन में हैं। फिर भी, ‘ग्रे जोन’ की व्याख्या अकसर बहुत सीमित मायनों में की जाती है, यानी पारंपरिक युद्ध की सीमा से नीचे होने वाली गतिविधियां- जैसे साइबर घुसपैठ, प्रॉक्सी संघर्ष, आर्थिक दबाव या दुष्प्रचार के अभियान। लेकिन हालिया संघर्ष एक गहरे बदलाव को दिखाते हैं। अब आधुनिक युद्ध लगातार बने रहने वाली ‘ग्रे जोन’ परिस्थितियों में लड़े जा रहे हैं- ऐसा रणनीतिक वातावरण, जिसकी खासियत अस्पष्टता, नियंत्रित तनाव वृद्धि, राजनीतिक संयम, तकनीकी असमानता और नैरेटिव की प्रतिस्पर्धा हैं। इसमें ग्रे जोन ऑपरेशन तो महज औजार हैं, जबकि ग्रे जोन परिस्थितियां वो व्यापक रणनीतिक वातावरण बनाती हैं, जिनमें हालिया संघर्ष घट रहे हैं। 21वीं सदी के वारफेयर को इसी अंतर से समझा जा सकता है। पारंपरिक संघर्ष स्पष्टत: दो चीजों पर आधारित होते थे- शांति या युद्ध, जीत या हार। यह धारणा अब समाप्त होती जा रही है। आधुनिक युद्ध शायद ही कभी पूरी जीत तक पहुंचते हैं। इसके बजाय, देश या दूसरे नॉन-स्टेट समूह संघर्ष में स्थितिजन्य लाभ, रणनीतिक बढ़त और मनोवैज्ञानिक प्रभाव हासिल करने की कोशिश करते हैं। साथ ही वे उस सीमा को पार करने से भी बचते हैं, जहां हालात को राजनीतिक रूप से संभालना कठिन हो। ईरान युद्ध में आज यही दिख रहा है। ये अस्पष्टता संघर्ष की कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा रणनीतिक हथियार बन चुकी है। इस बदलाव के लिए कई संरचनात्मक फैक्टर्स उत्तरदायी हैं। परमाणु हथियारों के कारण बड़ी ताकतें सावधानी बरतती हैं। परस्पर आर्थिक निर्भरता लंबे संघर्षों की कीमत बहुत बढ़ा देती है। सूचना क्रांति ने जवाबी कार्रवाई का समय बहुत कम कर दिया और सोशल मीडिया को युद्धक्षेत्र जैसा बना दिया है। सबसे अहम यह है कि तकनीकी विकास के चलते उन क्षमताओं तक सभी की पहुंच हो गई, जिन पर कभी सिर्फ बड़ी सैन्य ताकतों का एकाधिकार था। नतीजतन, स्पष्ट जीत हासिल कर पाना कठिन होता जा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध में भी यह साफ दिखता है। बड़े पारंपरिक सैन्य टकराव के बावजूद यह युद्ध आज भी परमाणु धमकियों, प्रतिबंधों, साइबर ऑपरेशनों और ड्रोन वारफेयर से निर्मित व्यापक ग्रे जोन में अटका है। भारी संसाधन खपाने के बावजूद किसी को निर्णायक बढ़त नहीं मिली। गाजा, लेबनान और यमन के संघर्षों में भी नजर आता है कि सैन्य श्रेष्ठता अब राजनीतिक समाधान की गारंटी नहीं देती। इजराइल के पास जबरदस्त सैन्य बढ़त है, लेकिन निर्णायक परिणाम हासिल नहीं हो सका, क्योंकि हूती जैसे समूह सस्ते ड्रोन और मिसाइलों के हमलों से लाल सागर के अहम समुद्री मार्गों को बाधित कर रहे हैं। कमजोर प्रतिद्वंद्वी अब पूरी जीत नहीं, बल्कि टिके रहने, बाधा डालने और बने रहने की क्षमता हासिल करना चाह रहे हैं। तकनीक के प्रसार ने भी कमजोर देशों और प्रॉक्सी समूहों की ड्रोन, साइबर टूल्स, सटीक मार करने वाली मिसाइलों और इन्फॉर्मेशन वारफेयर की क्षमताओं तक पहुंच सुलभ कर दी है। भले ही वे युद्ध जीतने में सक्षम न हों, लेकिन उनके पास मजबूत प्रतिद्वंद्वियों की निर्णायक जीत को रोके रखने की अभूतपूर्व क्षमता है। अब इससे एक नई रणनीतिक स्थिति पैदा हुई- जीत मिले बिना युद्ध से अलग होना। अकसर युद्ध अब औपचारिक शांति समझौते या आत्मसमर्पण से नहीं, बल्कि एक असहज विराम, अस्थायी सीजफायर या प्रबंधित तरीके से मिलिट्री डिसइंगेजमेंट के रूप में खत्म होते हैं। बड़ी ताकतें सैन्य श्रेष्ठता बनाए रखती हैं, लेकिन राजनीतिक उद्देश्य पूरी तरह हासिल नहीं कर पातीं। निर्णायक परिणामों का स्थान अब रणनीतिक थकान लेने लगी है। एक और महत्वपूर्ण बदलाव है- युद्धक्षेत्र का विस्तार। युद्ध अब केवल सेना और सीमा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बुनियादी ढांचा, संचार प्रणाली, एनर्जी ग्रिड, वित्तीय नेटवर्क और आम धारणा- ये सब भी युद्धक्षेत्र में आ चुके हैं। सैन्य अभियानों के साथ नैरेटिव मैनेजमेंट भी प्रमुख रणनीतिक साधन बन गया है। जो देश लंबे तनाव के दौरान सामाजिक एकता, आर्थिक स्थिरता और जनता का भरोसा बनाए रख सकेंगे, दीर्घकालिक रणनीतिक बढ़त उन्हें ही मिलेगी। निर्णायक परिणाम वाले युद्धों का युग समाप्त हो रहा है। उनकी जगह ऐसी स्थायी प्रतिस्पर्धाएं ले रही हैं, जो पारंपरिक युद्ध की सीमा के आसपास और उसके भीतर जारी रहती हैं। रणनीतिक अस्पष्टता अब एक प्रमुख हकीकत बन चुकी है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)