आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम:भारत की राष्ट्रीय राजनीति आखिर किस दिशा में जाएगी?
2024 के लोकसभा चुनावों को लगभग दो साल हो चुके हैं। ऐसे में आज भारत की राजनीति को कैसे समझा जाए? जनवरी 2024 में जब अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन हुआ, तब ऐसा लग रहा था कि हिंदू राष्ट्रवाद भारत की प्रमुख विचारधारा बन चुका है, लेकिन सिर्फ चार महीने बाद राजनीतिक माहौल में बड़ा बदलाव आ गया। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी ने कहा था कि वह संसद में 370 सीटें जीतना चाहती है और सहयोगियों के साथ मिलकर 400 से कम सीटें नहीं लाएगी, लेकिन पार्टी को सिर्फ 240 सीटें मिलीं। इसके बाद भी बीजेपी सरकार तो बना पाई, लेकिन राजनीतिक नैरेटिव पर उसकी पकड़ कमजोर पड़ गई। फिर कई राज्यों के चुनाव हुए और बंगाल में बड़ी जीत के बाद बीजेपी फिर से मजबूत स्थिति में लौट आई है। हालांकि, बीजेपी जिन दो राज्यों- बंगाल और असम में जीती, वहां लोकसभा की कुल 56 सीटें हैं, जबकि जिन दो राज्यों- तमिलनाडु और केरल में वह नहीं जीत पाई, वहां कुल 59 सीटें हैं। फिर भी ऐसा लगता है कि देश की राजनीति की दिशा बदल गई है। तमिलनाडु बंगाल से थोड़ा ही छोटा है- लोकसभा की 39 सीटें, जबकि बंगाल में 42 सीटें हैं। इन चुनावों में वहां एक नई पार्टी और नए नेता का उभार हुआ। पिछले कई दशकों से राजनीति पर हावी दोनों बड़ी पार्टियां हार गईं। फिर भी तमिलनाडु के नतीजों को सिर्फ क्षेत्रीय महत्व का माना गया, जबकि बंगाल के चुनाव परिणामों को राष्ट्रीय महत्व मिला। जबकि तमिलनाडु आज एक आर्थिक ताकत बन चुका है, वहीं आजादी के समय प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत में सबसे आगे रहने वाला बंगाल अब काफी पीछे चला गया है। 2020 तक तमिलनाडु की प्रति व्यक्ति जीडीपी राष्ट्रीय औसत की करीब 140% थी, जबकि बंगाल की प्रति व्यक्ति जीडीपी राष्ट्रीय औसत के 80% से भी कम थी। हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में बंगाली नागरिक काम की तलाश में तमिलनाडु गए हैं। लेकिन अब दिल्ली में सरकार चलाने वाली पार्टी ही कोलकाता में भी सत्ता में होगी। लगभग आधी सदी बाद राज्य में ऐसा हुआ है। ऐसे में बंगाल अब राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया है। यह राजनीतिक बदलाव इस संभावना को भी जन्म देता है कि राज्य की कुछ आर्थिक चमक फिर लौट सकती है, खासकर अगर बीजेपी की जीत के बाद निजी निवेशक तेजी से यहां निवेश करने लगें। बंगाल जल्द ही तमिलनाडु की बराबरी तो नहीं कर पाएगा, लेकिन वह बहुत बड़ा, ऐतिहासिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण और प्रतिभा से भरपूर राज्य है, इसलिए वह लंबे समय तक पिछड़ा नहीं रह सकता। जहां आर्थिक खबरें कुछ उम्मीद जगा सकती हैं, वहीं राजनीतिक खबरें चिंता का कारण हैं। इस चिंता को समझाने के लिए राजनीति विज्ञान में उभरे एक नए महत्वपूर्ण विचार की बात करनी होगी- प्रतिस्पर्धी सर्वसत्तावाद या कॉम्पीटिटिव अथॉरिटेरियनिज्म। जर्नल ऑफ डेमोक्रेसी में अप्रैल 2002 में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण लेख में हार्वर्ड के स्टीवन लेविट्स्की और टोरंटो के लुकन वे ने कहा था कि 1990 और 2000 के दशक में दुनिया के कई हिस्सों में एक नई तरह की राजनीतिक व्यवस्था उभरी। यह व्यवस्था एक तरफ लोकतंत्र से अलग थी और दूसरी तरफ सर्वसत्तावाद से भी अलग। यह दोनों के बीच की स्थिति थी। असम में जेरिमैंडरिंग और बंगाल में एसआईआर इस विचार के प्रतीक हैं। दोनों चुनावी तरीके एक जैसे नहीं हैं, लेकिन उनके नतीजे काफी मिलते-जुलते हो सकते हैं। जेरिमैंडरिंग में चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं इस तरह बदली जाती हैं कि जिन समुदायों की सत्ताधारी पार्टी को वोट देने की सम्भावना नहीं है, उन्हें कुछ सीमित सीटों में ज्यादा संख्या में रखा जाए, जबकि जिन समुदायों की सत्ता पक्ष को वोट देने की ज्यादा सम्भावना है, उन्हें ज्यादा सीटों में फैला दिया जाए। एसआईआर में चुनावी क्षेत्र नहीं बदले जाते, लेकिन कुछ समुदायों या वर्गों के वोट देने के अधिकार को कम किया जाता है। अगर ऐसे कदम पूरे देश में उठाए जाते हैं, तो भारत में चुनाव तो होंगे और वह पूरी तरह सर्वसत्तावादी नहीं बनेगा। लेकिन क्या तब वह एक अर्थपूर्ण लोकतंत्र बना रह सकेगा? तीन चीजें इसे रोक सकती हैं- संघीय व्यवस्था, न्यायपालिका और विपक्ष की मजबूती और एकजुटता। हाल ही में हंगरी में विक्टर ऑर्बन की हार दिखाती है कि अगर विपक्ष बड़े पैमाने पर समर्थन जुटा ले, तो वो क्या कर सकता है। एक अर्थपूर्ण लोकतंत्र के लिए तीन चीजें बहुत जरूरी होती हैं- संघीय व्यवस्था, न्यायपालिका और विपक्ष की मजबूती और एकजुटता। हाल ही में हंगरी में विक्टर ऑर्बन की हार दिखाती है कि अगर विपक्ष बड़े पैमाने पर समर्थन जुटा ले, तो वो क्या कर सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)