एन. रघुरामन का कॉलम:हमारी जिंदगी में ‘ह्यूमनॉइड्स’ का ‘तड़का’ लगने लगा है
हमारी जिंदगी में ह्यूमनॉइड्स का भरपूर ‘तड़का’ हमारी सोच से भी जल्दी लगने वाला है। यह पहले से लग भी रहा है। चीनी ह्यूमनॉइड रोबोट अब सिर्फ फैक्ट्रियों, वेयरहाउस या लैब्स तक सीमित नहीं हैं। वे अब खेल जैसे क्षेत्र में भी कदम रख रहे हैं, जिसमें निर्विवाद रूप से इंसानों की बढ़त रही है। इस हफ्ते बीजिंग में हुए वर्ल्ड ह्यूमनॉइड रोबोट गेम्स के दूसरे संस्करण में 2 हजार से ज्यादा ह्यूमनॉइड रोबोटों ने हिस्सा लिया। पांच दिनों तक चले इस आयोजन में 51 इवेंट हुए, जिनमें टेबल टेनिस, फुटबॉल और एथलेटिक्स शामिल थे। इसकी अहमियत का कारण रोबोटों का आपसी मुकाबला नहीं, बल्कि वो गति है, जिससे वो इंसानी शारीरिक क्षमताओं की नकल करने लगे हैं। इवेंट की रिपोर्टों में यह तक बताया गया कि ह्यूमनॉइड इंसानों के एथलेटिक रिकॉर्ड को चुनौती दे रहे हैं। इसमें उसेन बोल्ट का 100 मीटर स्प्रिंट रिकॉर्ड भी शामिल है। इस दौड़ को ह्यूमनॉइड रोबोट ने 9.39 सेकंड में पूरा कर जमैका के बोल्ट द्वारा 2009 में बनाया गया 9.58 सेकंड का रिकॉर्ड तोड़ दिया। एक्स-ह्यूमनॉइड कंपनी के रोबोट ने 14.5 मीटर प्रति सेकंड की अधिकतम रफ्तार हासिल की। रोबोट गेम्स से तीन दिन पहले वित्तीय जगत ने भी एक और संकेत दिया कि यह तकनीक किस दिशा में जा रही है। चीनी ह्यूमनॉइड रोबोट निर्माता ‘यूनिट्री रोबोटिक्स’ ने शंघाई ट्रेडिंग डेब्यू में 460% की छलांग लगाई और कंपनी का बाजार मूल्य करीब 51 अरब डॉलर पहुंच गया। कंपनी के इस शानदार डेब्यू में ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स को लेकर बड़ी उम्मीदें और इस क्षेत्र में चीन के ग्लोबल लीडर बनने की महत्वाकांक्षा प्रतिबिम्बित होती है। यूनिट्री के इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग के लिए सर्वाधिक ओवर-सब्स्क्रिप्शन हुआ। डेब्यू के दौरान कंपनी में हिस्सेदारी लेने के लिए 98 लाख निवेशकों ने आवेदन किया, लेकिन 5 हजार में से 1 से भी कम निवेशक ही सफल हो पाए। ‘युशु टेक्नोलॉजी’ के आधिकारिक नाम वाली इस कंपनी का नेतृत्व 36 वर्षीय मैकेनिकल इंजीनियर वांग शिंगशिंग कर रहे हैं। इन दोनों घटनाओं को साथ रखें तो संदेश को नजरअंदाज करना मुश्किल है- ह्यूमनॉइड अब फैक्ट्री फ्लोर से हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में आ रहे हैं। कई वर्षों तक मोटे तौर पर चर्चा यही थी कि रोबोट दोहराए जाने वाले कामों में इंसानों की जगह ले सकते हैं। हम रोबोट को कारें असेंबल करते, डिब्बे इधर-उधर ले जाते, फर्श साफ करते या खाना परोसते हुए देखते थे। लेकिन अगला चरण कहीं ज्यादा व्यापक हो सकता है। ह्यूमनॉइड्स अस्पतालों, घरों, होटलों, रिटेल स्टोर्स और ऑफिसों का हिस्सा बन सकते हैं। वे बुजुर्गों की मदद, खतरनाक काम, बच्चों की पढ़ाई, मेहमानों का मनोरंजन और इंसानों की सहायता जैसे काम कर सकते हैं। अब खेल में भी एक नई संभावना दिख रही है- मनोरंजन का क्षेत्र भी मशीनों के लिए प्लेग्राउंड बन सकता है। ऐसे भविष्य की कल्पना कीजिए, जिसमें ह्यूमनॉइड फुटबॉल लीग, रोबोट मैराथन या रोबोट बॉक्सिंग लोगों का प्राइम-टाइम एंटरटेनमेंट बन जाए। स्टेडियम मानव और मशीन का नहीं, बल्कि मशीनों का मशीनों से मुकाबला देखने के लिए भर सकते हैं, जिसमें इंसान अपने पसंदीदा रोबोट के लिए चीयर करें। आज यह साइंस फिक्शन लग सकता है। लेकिन बीजिंग गेम्स बताते हैं कि यह साइंस फिक्शन कितनी जल्दी दर्शकों का खेल बन सकता है। इसलिए असली बदलाव सिर्फ यह नहीं कि ह्यूमनॉइड बेहतर रोबोट बन रहे हैं, बल्कि यह है कि वे उन जगहों पर पहुंचने लगे हैं, जिन्हें हम खासकर इंसानों की मानते थे। और यहीं हमारे सामने एक बड़ा सवाल आता है- जैसे-जैसे मशीनें इंसानों जैसी होती जाएंगी, क्या इंसान भी मशीनों जैसे हो जाएंगे? पहले ही हम खुद को स्पीड, इफिशियंसी, प्रोडक्टिविटी और परफॉर्मेंस के पैमाने पर माप रहे हैं और इन खूबियों में मशीनें तेजी से हमसे बेहतर हो रही हैं। असली चुनौती शायद ह्यूमनॉइड्स से उनके क्षेत्र में मुकाबले की नहीं, बल्कि उन मूल्यों को बचाने की है, जो हमें इंसान बनाते हैं- एम्पैथी, इमेजिनेशन, ह्यूमर, कम्पैशन, क्यूरोसिटी और बदले में कुछ मिलने की अपेक्षा के बिना केयर करने की क्षमता। जैसे-जैसे ह्यूमनॉइड चलना, दौड़ना, खेलना और एंटरटेन करना सीखते जाएंगे, हमें तय करना पड़ सकता है कि भविष्य में हमें मशीनों जैसा बनना है या जानबूझकर ज्यादा इंसान बने रहना है। फंडा यह है कि ह्यूमनॉइड्स का ‘तड़का’ अब लगने वाला नहीं है, बल्कि पहले ही लग चुका है। मॉर्गन स्टेनली का अनुमान है कि इस साल चीन का ह्यूमनॉइड्स शिपमेंट 50 हजार का होगा, जो 2030 तक बढ़कर 4.40 लाख से ज्यादा हो जाएगा।