कौशिक बसु का कॉलम:दुनिया में कम जॉब्स के बावजूद ग्रोथ के विरोधाभास को समझें

Sep 1, 2026 - 06:13
कौशिक बसु का कॉलम:दुनिया में कम जॉब्स के बावजूद ग्रोथ के विरोधाभास को समझें
आज दुनिया में एक खास तरह का आर्थिक-विभाजन दिखलाई दे रहा है। लोग दोहरे आर्थिक परिदृश्य का सामना कर रहे हैं। भारत की ही बात करें तो यहां युवाओं में बेरोजगारी की दर ऊंची है और कॉलेजों-विश्वविद्यालयों से निकलने वाले युवाओं के लिए नौकरियों की किल्लत है। युवाओं में बेरोजगारी दर 2025 में 2.1 प्रतिशत अंक बढ़कर 17.7 प्रतिशत हो गई। नतीजतन, इनमें से कई युवा और उनके परिवार वास्तविक आय में गिरावट का सामना कर रहे होंगे। लेकिन दूसरी ओर अर्थव्यवस्था भी तेजी से बढ़ती जा रही है और 2025 में प्रति व्यक्ति जीडीपी में 6.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। लेकिन यहां भी आंकड़े वास्तविक तस्वीर को छिपाते हैं। क्योंकि आबादी के एक छोटे हिस्से की आय में तो तेज वृद्धि हुई है, लेकिन बड़ी संख्या में लोग आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। इतने गहरे आर्थिक विभाजन को बने रहने देना नीतिगत-विफलता है। अपेक्षाकृत कम मजदूरी वाले मध्यम आय के देश के रूप में भारत सही नीतियों के सहारे अपने युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार पैदा कर सकता है। यह बात तब भी सही है, जब श्रम बाजार के मौजूदा रुझान एआई और अन्य डिजिटल तकनीकों से प्रभावित हो रहे हों, जो मानव-श्रम की मांग घटाती हैं और मुनाफे को कुछ हाथों में केंद्रित करती हैं। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्थाएं अधिक खंडित होती जा रही हैं, नीति-निर्माताओं, विश्लेषकों और अन्य पर्यवेक्षकों को समग्र आंकड़ों के नीचे छिपी वास्तविकता पर अधिक ध्यान देना होगा। हम शायद उस दौर में प्रवेश कर रहे हैं, जिसे ‘गेटेड रिसेशन’ कहा जा सकता है। यह ऐसी स्थिति है, जिसमें कुछ समूह या क्षेत्र मंदी जैसी परिस्थितियों से गुजरते हैं, जबकि अमीर लगातार और अमीर होते जाते हैं। इससे ओवरऑल आर्थिक इंडिकेटर अच्छे दिखाई देते रहते हैं। मिसाल के तौर पर, भारत में निम्न-मध्यम वर्ग के परिवार- खासकर वे, जिनके युवा बच्चे अभी-अभी कॉलेज से निकले हैं- व्यावहारिक रूप से ऐसे ही ‘गेटेड रिसेशन’ में फंसे हो सकते हैं। अमेरिका में भी कम आय वाले लोगों की सबसे अधिक आबादी वाले मिसिसिपी, न्यू मैक्सिको, लुइजियाना और ओक्लाहोमा जैसे राज्य श्रम बाजार की स्थिति बिगड़ने के साथ स्थानीय स्तर पर ऐसे ‘गेटेड रिसेशन’ का अनुभव करते हैं। मुद्दा किसी पार्टी या सरकार पर दोष मढ़ने का नहीं है, क्योंकि इन असमानताओं के कारण अकसर बहुत गहरे और जटिल होते हैं। फिर भी, राजनेताओं को इस समस्या पर उनकी प्रतिक्रिया के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। उन्हें अच्छे आंकड़ों का हवाला देकर इस समस्या को खारिज करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। देर-सबेर इन विभाजनों को दूर करने के लिए बहुआयामी नीतिगत हस्तक्षेपों की ही जरूरत होगी। जैसे-जैसे एआई आगे बढ़ेगा, संपत्ति की असमानता के भी और तेजी से बढ़ने की आशंका है। एआई को अपनाने से संकोच करते हुए नौकरियां बचाने की कोशिशें फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी। इससे महंगे आर्थिक संकट पैदा होंगे और उत्पादकता वृद्धि पर भी बोझ पड़ेगा। ‘गेटेड समृद्धि’ और ‘गेटेड गरीबी’ के बीच की दीवारों को तोड़ने तथा तकनीकी प्रगति से होने वाले लाभ को व्यापक रूप से समाज तक पहुंचाने का अधिक प्रभावी तरीका यह हो सकता है कि सुपर-रिच की संपत्ति, विरासत और आय पर ऊंचे मार्जिनल टैक्स लगाया जाएं। अमेरिका से आ रही खबरों पर ध्यान दें। ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स के ताजा आंकड़े बताते हैं कि जुलाई में अमेरिकी अर्थव्यवस्था से 23,000 नौकरियां चली गईं, लेकिन इसके बावजूद बेरोजगारी दर घटी है। इस विरोधाभास का कारण यह है कि अमेरिका में किसी व्यक्ति को बेरोजगार माने जाने के लिए उसका सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश करना जरूरी है। लेकिन आज श्रम बाजार की स्थिति इतनी निराशाजनक हो चुकी है कि लोग नौकरी तलाशना ही छोड़ रहे हैं। कुछ अनुमानों के अनुसार नवंबर 2025 से अब तक 20 लाख से अधिक लोग अमेरिकी वर्कफोर्स से बाहर हो चुके हैं। यह चौंकाने वाला आर्थिक विभाजन है। एक ओर कामगार नुकसान उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जिनकी आय शेयर बाजार और कॉर्पोरेट मुनाफे पर निर्भर है, उनके लिए तेजी का दौर चल रहा है। नौकरियां जाने और श्रम बाजार की स्थिति बिगड़ने की खबरों के साथ ही अमेरिकी शेयर बाजारों में उलटे तेजी आई है। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)