डॉ. अरुणा शर्मा का कॉलम:एजुकेशन महंगी होती जाएगी तो हम अपना भविष्य कैसे गढ़ेंगे?

Aug 25, 2026 - 06:43
डॉ. अरुणा शर्मा का कॉलम:एजुकेशन महंगी होती जाएगी तो हम अपना भविष्य कैसे गढ़ेंगे?
गरीबी के ट्रैप पर तो काफी बहस होती है। लेकिन क्या हम एक नए एजुकेशन ट्रैप में भी प्रवेश नहीं कर रहे हैं? भारत की 65 प्रतिशत आबादी युवा है। ऐसे में शासन की सर्वोच्च प्राथमिकता इस युवा आबादी को देश की ताकत में बदलना होनी चाहिए। लेकिन क्या हमारी नीतियां, शिक्षा-व्यवस्था और रोजगार-सृजन की प्रणाली युवाओं की क्षमता को अधिकतम रूप से विकसित करने की दिशा में काम कर रही हैं? चुनौती यह है कि आने वाले दशक के लिए भारत के पास मौजूद वर्कफोर्स की क्षमता किफायती और अच्छी शिक्षा हासिल करने के अवसरों में हो रही गिरावट के कारण धीरे-धीरे क्षीण हो रही है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बेहतर जीवन-स्तर का सपना शिक्षा और उपयुक्त कौशल हासिल करने से जुड़ा है। साइनबोर्ड और पोस्टर बनाने वाला पेंटर अब कंप्यूटर डिजाइनिंग की ओर बढ़ गया है और फ्लेक्स बनाने लगा है। हमें लगातार बदलाव करते हुए शारीरिक श्रम से अधिक ऑटोमैटेड मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ना होगा। अपनी मजबूत शिक्षा-व्यवस्था के दम पर हमने दुनिया को बेहतरीन प्रतिभाएं दी हैं। लेकिन क्या हमने उस बढ़त को कायम रखा है? या फिर नए प्रयोग करने की होड़ में हमने अपनी मौजूदा संस्थागत ताकत को ही कमजोर कर दिया है? हमारी पिछली पीढ़ी के लिए सस्ती और सुलभ सार्वजनिक शिक्षण-संस्थाएं उपलब्ध थीं, जबकि आज की युवा पीढ़ी को फीस और कोचिंग पर भारी रकम खर्च करनी पड़ती है और अंततः चयन तथा परीक्षा प्रक्रियाओं की व्यवस्था के बार-बार विफल होने के जाल में फंसना पड़ता है। युवा ऐसी व्यवस्था के दुष्चक्र में फंस रहे हैं, जिसमें गुणवत्ता सुनिश्चित करने और शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए जिम्मेदार एजेंसियों की अक्षमता और जवाबदेही के अभाव के कारण उनके सामने पेशेवर विकल्प चुनने के अवसर भी घट रहे हैं। यही ‘एजुकेशन ट्रैप’ है- एक ऐसा दुष्चक्र, जिससे निकलना मुश्किल होता जाता है। पुराने और प्रतिष्ठित व्यावसायिक संस्थानों में प्रवेश के लिए चयन प्रक्रियाएं पात्रता तय करने वाली परीक्षाओं और प्रतियोगी प्रवेश परीक्षाओं के संचालन में विफल होती रही हैं। इससे छात्रों को अपने सपनों को पूरा करने का अवसर देने की इन व्यवस्थाओं की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। भारत लंबे समय से अपनी अत्यधिक कुशल, शिक्षित और प्रशिक्षित वर्कफोर्स को दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भेजने के लिए जाना जाता रहा है। इन लोगों ने अपनी मेहनत और क्षमता के बल पर अपने संस्थानों और देश का गौरव बढ़ाया है। भारत में भी उन्होंने सरकारी, सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में योगदान दिया और उन्हें नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। इनमें से अधिकांश ने सार्वजनिक शिक्षा-व्यवस्था के तहत स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई की थी। करदाताओं के धन की प्राथमिकताओं में से एक ऐसी शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करना भी है, जो सर्वोत्तम गुणवत्ता वाली और सस्ती हो। बढ़ती आबादी और बेहतरीन व्यावसायिक शिक्षा के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या हम आज भी सस्ती शिक्षा उपलब्ध करा पा रहे हैं? 2002 में 86वें संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद 21-ए जोड़कर शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया गया और इसके लिए 1 अप्रैल 2010 को कानून लागू हुआ। इसके साथ सार्वजनिक शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर बढ़ा और एनरोलमेंट्स का स्तर 98 प्रतिशत तक पहुंचा, जिससे लाखों बच्चे शिक्षा के दायरे में आए। लेकिन ‘लर्निंग डेफिसिट’ यानी सीखने की कमी बनी रही। उसके बाद इस व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय हमारा फोकस निजी स्कूलों में बढ़ते दाखिलों की ओर मुड़ गया, जिससे शिक्षा दिन-ब-दिन महंगी होती चली गई। नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार पिछले एक दशक में 94,000 सरकारी स्कूल या तो बंद हुए या उनका विलय कर दिया गया, जिससे वंचित तबकों के लिए शिक्षा तक पहुंच का सवाल गंभीर हो गया है। देश के दूर-दराज के इलाकों तक शिक्षा की पहुंच बढ़ाने के प्रयास पीछे छूटते जा रहे हैं। सरकारी स्कूलों में दाखिले में भी 6 प्रतिशत की गिरावट आई है और स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है। इस तरह शिक्षा- जो सामाजिक और आर्थिक खाई को पाटने का सबसे बड़ा माध्यम होनी चाहिए- वही इस खाई को और चौड़ा करती दिखाई दे रही है। सरकारी स्कूलों की संख्या 2014-15 में 11.07 लाख से घटकर 2024-25 में 10.13 लाख रह गई है। यह गिरावट देश में ऐसे लाखों ‘मिसिंग स्टूडेंट्स’ की स्थिति पैदा करती है, जो एक वंचित आबादी के रूप में चुनौती बने रहेंगे। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)