नवनीत गुर्जर का कॉलम:हे सरकार! खन्दक से निकली हो या पाताल से?
भले कुछ दिन ही रहा, लेकिन युद्ध विराम देखकर लग रहा था, कोई समाधान निकलने वाला है। तेल और गैस संकट से लगातार जूझ रही दुनिया को कुछ राहत मिल सकेगी। लेकिन बम फिर फूटने लगे हैं। मिसाइलों के मुंह फिर खुल गए हैं। न अमेरिका मान रहा है, न ईरान। दरअसल, सरकारें किसी भी देश की हों, इनका स्वभाव लगभग एक जैसा ही होता है। ये किसी खोह-खन्दक से उभरी हैं, या गहरे पाताल से निकली हैं? इनकी दृष्टि निरी अजीब। देवमय भी। दैत्यमय भी। इनकी गंध, जैसे सांझ की आंधी। इनके आदेशों के गहने, केवल भयानक। और इनका साथ, जैसे कोई कब्र में उतरता जाए ...! जी! सरकार शब्द की परिभाषा अब कुछ ऐसी ही है। कभी वह एयरपोर्ट पर कतार लगाकर बाबा रामदेव के आगे नतमस्तक होती है और कभी वही सरकार उसी बाबा को आधी रात को डंडे मारकर भगाती है। कभी वह अन्ना हजारे को गांधी जी की तरह सम्मान देती है और कभी उन्हीं अन्ना हजारे को समानांतर सरकार चलाने की मंशा रखने वाला बिजूका बताती है। कभी वह किसी भ्रष्टाचारी नेता पर बेतहाशा छापे मारती है, लेकिन वही नेता जब सरकारी पाले में आ जाता है तो उसके तमाम पाप धुल जाते हैं। देश की सीमा छोड़ें तो दिखता है- सुबह ट्रम्प सरकार ईरान को अभयदान देने का डंका बजाती है और वही सरकार शाम को ईरान पर बम फोड़ देती है। ये दोनों शांत होते हैं तो इजराइल सरकार, लेबनान को नेस्तनाबूद करने पर तुल जाती है। तब मर्यादा और संयम उस सागर में तैरते-डूबते दिखाई देते हैं, जिसमें निराशा के खारे लेकिन बलशाली पानी के सिवाय और कुछ भी नहीं है। अनगिनत देशों के तेल से लदे सैकड़ों जहाज होर्मुज के आसपास समंदर में डूब मरने को मजबूर हैं। आत्महत्या के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं है। किसी को दुनिया की नहीं पड़ी। किसी को मानवता की फिक्र नहीं है। सब के सब महंगा तेल बेचने के लिए उतावले हैं। ऊपर से मौसम के बदलाव ने हमारे भारत तक में उत्पादन की रफ्तार को धीमा करने की ठान ली है। सुना है, इस बार दस से पंद्रह प्रतिशत कम बारिश होने वाली है। इसका सीधा असर खेती-किसानी और अनाज उत्पादन पर पड़ने वाला है। हालांकि लम्बी भीषण तपिश के बाद देश के कई इलाकों में आंधी-बारिश ने गर्मी से कुछ हद तक राहत तो दी है लेकिन इस बारिश से खेती को ज्यादा कोई फायदा नहीं है। ऊपर से इस बेमतलब की बारिश के कारण जरूरत पड़ने पर आगे होने वाली बारिश का कोटा कम होने की आशंका जरूर है। होर्मुज के कारण वक्त पर किसानों को डीजल और खाद नहीं मिल पाने की आशंका बलवती हो रही है, सो अलग! फिलहाल तो मौसम छुई-मुई-सा हो रहा है। पल में तोला, पल में माशा। हालांकि मौसम पर किसी देश की सरकार का कोई बस नहीं चलता, वरना ये मंत्री, नेता अपने-अपने हिस्से का छेद बादलों में भी कर आते। फिर जनता या आम आदमी का तो जो होता सो होता, इनके खेत-खलिहानों, बाग-बगीचों में बारिश होती रहती। लम्बे समय से अपना घर भरने, अपना हित देखने के सिवाय इनके पास कोई काम ही कहां है? खैर, इतने तेल संकट के बावजूद इस दिशा में मितव्ययिता कहीं नजर नहीं आ रही है। नेता और मंत्रीगण, प्रधानमंत्री की अपील के कुछ दिन बाद तक जो दिखावा कर सकते थे, उन्होंने श्रद्धापूर्वक किया, इसके बाद वे भी अपने पुराने ढर्रे पर लौट आए हैं। फिलहाल अमेरिका-ईरान-इजराइल युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा है। दूर-दूर तक किसी के झुकने या नरम पड़ने के संकेत नहीं हैं। अगर खारे समंदर में तीन-चार महीने इसी तरह बमबारी होती रही, इसी तरह मिसाइलें दागी जाती रहीं तो ये पूरा साल, बल्कि अगले साल तक भी स्थिति सुधरने वाली नहीं है। क्योंकि आज ही युद्ध रुक जाए तो भी स्थिति सामान्य होने में कोई छह-सात महीने तो लगेंगे ही। अंदाजा लगाया जा सकता है कि आगे क्या होगा और किस तरह समय गुजरने वाला है! अपना घर भरने के सिवा?
मौसम पर किसी सरकार का बस नहीं चलता, वरना ये मंत्री, नेता अपने-अपने हिस्से का छेद बादलों में भी कर आते। फिर जनता का तो जो होता सो होता, इनके खेत-खलिहानों, बाग-बगीचों में बारिश होती रहती। अपना घर भरने के सिवाय इनके पास कोई काम ही कहां है?