पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:मां के हाथ के भोजन में होते हैं स्मृति, प्रेम और पवित्रता
अपनी हैसियत के बाहर जाकर बच्चों के भविष्य के लिए कुछ करना आज भारतीय माता-पिता की जीवनशैली बन गया है। वहीं सरकार में बैठे लोग अपनी हरकतों से बच्चों के सपनों पर प्रहार करते हैं। इस समय परीक्षा-शैली, पढ़ाई-लिखाई, बेरोजगारी के कारण घरों में बच्चे अत्यधिक परेशान हैं। ऐसे में माता-पिता को एक प्रयोग करना चाहिए। खास तौर पर मांएं यह प्रयोग करें कि वे भोजन अपने हाथों से बनाएं और मां के हाथ का बना हुआ भोजन ही बच्चे प्राप्त करें। इन दिनों हमारे यहां रसोईघर मां के हाथ से निकलकर किन्हीं और हाथों में चला गया है। क्योंकि मां के हाथ के भोजन में अनुभव, स्मृति, प्रेम और पवित्रता उतरती ही है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मां भोजन बनाना जानती है या नहीं जानती, लेकिन स्पर्श अगर कर दे तो भी भोजन का भाव बदल जाएगा। हम भारतीय भोजन को केवल खाद्य सामग्री नहीं, एक अस्तित्व मानते हैं, जीवित समझते हैं। हमारे यहां भोजन में प्राण प्रतिष्ठा की जाती है प्रसाद बनाकर लंगर और भंडारों में। मंदिरों में जितना मान मूर्ति का है, वहां चढ़ाए भोग का भी उतना ही है।