पवन के. वर्मा का कॉलम:हमारी राजनीति में हमेशा ही विसंगतियां क्यों बनी रहती हैं?

Aug 14, 2026 - 18:13
पवन के. वर्मा का कॉलम:हमारी राजनीति में हमेशा ही विसंगतियां क्यों बनी रहती हैं?
हमें स्वीकारना होगा कि हमारे लोकतंत्र के केंद्र में एक विरोधाभास है। हम इसमें व्याप्त विसंगतियों का विरोध तो करते हैं, लेकिन शायद ही कभी पूछते हैं कि वे क्यों बनी रहती हैं। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, परीक्षा में अनियमितताओं, महंगाई, आरक्षण, हिंसा और अन्याय जैसे मुद्दों को लेकर समय-समय पर आंदोलन खड़े तो होते हैं, लेकिन जैसे ही तात्कालिक मुद्दा हल हो जाता है या टाल दिया जाता है, बड़ा मर्ज जस का तस बना रहता है। इसलिए सवाल किसी मुद्दे पर सरकार की जवाबदेही का ही नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या हमारी राजनीति के संस्कार कभी बदलेंगे? भारतीय राजनीति की विसंगतियों पर किसी एक दल का एकाधिकार नहीं, वे पूरे परिदृश्य में ही छाई हुई हैं। जो दल लोकतंत्र के पक्ष में जोरदार दलीलें देते हैं, वे खुद अपने भीतर लोकतांत्रिक तौर-तरीकों का पालन नहीं करते। जो चुनावों में धन के दुरुपयोग की आलोचना करते हैं, वे चुनाव जीतने और सत्ता बनाए रखने के लिए अकसर ऐसी धनराशि का इस्तेमाल करते हैं, जिसका कोई हिसाब नहीं होता। जो राजनीति के अपराधीकरण पर हमला करते हैं, वे भी चुनावी समीकरण अपने पक्ष में होने पर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को लेकर समझौता कर लेते हैं। जो योग्यता की बात जोरदार ढंग से करते हैं, वे भी अकसर योग्यता को जाति, समुदाय, पारिवारिक संबंधों या जिसे व्यावहारिक भाषा में ‘चुनाव जीतने की क्षमता’ कहा जाता है, के अधीन करने को पूरी तरह तैयार रहते हैं। दलों के अंदरूनी लोकतंत्र पर गौर करें। अधिकांश दल नागरिकों से अपने पक्ष में वोट मांगते समय ऊपर से तो लोकतांत्रिक नजर आते हैं, लेकिन पार्टी के भीतर नेतृत्व अकसर किसी परिवार या छोटे-से गुट तक सीमित रहता है। वंशवादी राजनीति बढ़ती जा रही है। चुनाव अब असाधारण रूप से महंगे उपक्रम बन चुके हैं। इनकी फंडिंग काफी हद तक ऐसे धन से होती है, जिसका कोई हिसाब नहीं होता। धन चुनाव जीतने में मदद करता है; इससे सत्ता तक पहुंच मिलती है और यह पहुंच आगे और धन पैदा कर सकती है। जब तक राजनीतिक फंडिंग अधिक पारदर्शी और जवाबदेह नहीं बनती, तब तक लोकतंत्र तेजी से ऐसे संसाधनों पर निर्भर होता जाएगा, जिन्हें नागरिक देख नहीं सकते और जिनकी संस्थाएं पर्याप्त रूप से जांच नहीं सकतीं। अपराधीकरण भी एक चिंताजनक विरोधाभास सामने लाता है। हम अकसर आपराधिक मामलों वाले नेताओं के राजनीति में प्रवेश पर चिंता जताते हैं, लेकिन जब किसी उम्मीदवार को ‘जिताऊ’ माना जाता है, तो उसके चुनाव लड़ने का बचाव भी करने लगते हैं। जातिगत समीकरण एक और असहज सच्चाई सामने रखते हैं। जाति राजनीतिक लामबंदी का एक शक्तिशाली माध्यम बनी हुई है, क्योंकि वह ऐतिहासिक अन्यायों और आज भी कायम सामाजिक पहचानों से जुड़ी है। लेकिन ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने और सामाजिक विभाजनों को लगातार चुनावी कमोडिटी में बदलते रहने में फर्क है। पहला लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है; दूसरा राजनीतिक अवसरवाद में बदल सकता है। और राजनीतिक बहसों का क्या? संसद और विधानसभाओं में अकसर शोर-शराबा ही देखने को मिलता है। धीरे-धीरे असहमति आरोप में, आरोप दुर्व्यवहार में और दुर्व्यवहार सदन की कार्यवाही बाधित करने में बदल जाता है। सार्वजनिक विमर्श में शिष्टाचार खत्म-सा हो गया है। संवैधानिक और सार्वजनिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता सत्ता के मनमाने इस्तेमाल पर अंकुश लगाती है, लेकिन जब किसी सत्तारूढ़ दल की सुविधा के लिए इन्हें कमजोर किया जाता है, तो नुकसान किसी एक सरकार तक सीमित नहीं रहता। राजनीतिक दल बदलते रहते हैं; संस्थागत क्षरण लंबे समय तक बना रह सकता है। राजनीति में धर्म का इस्तेमाल- फिर चाहे बहुसंख्यकों के तुष्टीकरण के लिए हो या अल्पसंख्यकों के- भी एक समस्या है। यह सच है कि धर्म भारतीयों की सांस्कृतिक चेतना में गहराई से गुंथा हुआ है, लेकिन चुनावी लामबंदी के लिए धार्मिक पहचानों का शोषण करना बिल्कुल अलग बात है। जब आस्था राजनीतिक ध्रुवीकरण का साधन बन जाती है, तो नागरिकों को वोट बैंक और परस्पर विरोधी खेमों में बांटा जाने लगता है। अगर हमारी राजनीति के संस्कार नहीं बदलते हैं, तो व्यवस्था अंततः विरोध-प्रदर्शनों को भी अपने भीतर समाहित कर लेगी, उनकी शब्दावली को अपना लेगी और पहले की तरह चलती रहेगी। प्रदर्शनकारी नेता बन जाएंगे और नारे घोषणा-पत्र, लेकिन अंततः वे खुद को उन्हीं विकृतियों के अनुसार काम करते हुए पा सकते हैं, जिनकी कभी उन्होंने निंदा की थी। अगर हमारी राजनीति के संस्कार नहीं बदलते हैं, तो व्यवस्था विरोध-प्रदर्शनों को भी अपने भीतर समाहित कर लेगी, उनकी शब्दावली को अपना लेगी और पहले की तरह चलती रहेगी। प्रदर्शनकारी नेता बन जाएंगे और नारे घोषणा-पत्र। (ये लेखक के अपने विचार हैं)