मनोज जोशी का कॉलम:एलएसी पर चीन की हरकतों की ‘टाइमिंग’ समझना जरूरी
पिछले तीन-चार हफ्तों में तवांग के उत्तर-पूर्व और असफी-ला दर्रे के निकट स्थित तक्सिंग क्षेत्र में एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) के पार चीनी फौजों (पीएलए) की घुसपैठ की खबरें सामने आई हैं। यहां पीएलए ने कथित तौर पर भारतीय सेना की अपने पैट्रोलिंग पॉइंट्स तक पहुंच रोक दी है। सरकार ने इस तरह की किसी घटना से इनकार किया है। लेकिन अरुणाचल टाइम्स ने घटनाक्रम की रिपोर्ट प्रकाशित की है और पूर्व गृह सचिव आर.के. सिंह ने आरोप लगाया है कि यह तक्सिंग क्षेत्र में शेरा-5 पैट्रोलिंग पॉइंट को भारत द्वारा छोड़ दिए जाने का परिणाम है। दरअसल, जो कुछ हुआ है, उसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। चीन यह स्वीकार नहीं करता कि यहां एलएसी मैकमोहन रेखा से निर्धारित होती है। उसका दावा है कि पूरा अरुणाचल प्रदेश ही उसका क्षेत्र है और वह इसे जांगनान या दक्षिणी तिब्बत कहता है। 1962 के भारत-चीन युद्ध में चीन ने पूरे नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) पर कब्जा कर लिया था। उस समय अरुणाचल प्रदेश को उसी नाम से जाना जाता था। हालांकि, इसके बाद उसने अपनी सेनाएं मैकमोहन रेखा के उत्तर में वापस बुला ली थीं। लेकिन 1950 के दशक से ही मैकमोहन रेखा के वास्तविक मार्ग को लेकर भी मतभेद रहे हैं और इसी वजह से भारत और चीन के बीच दावे और काउंटर-क्लेम्स होते रहे हैं। 2003 में प्रधानमंत्री वाजपेयी की बीजिंग यात्रा की पूर्व संध्या पर एक चीनी गश्ती दल ने असफी-ला के पास भारतीय सैनिकों के एक छोटे दल से उनके हथियार छीन लिए थे और बाद में उन्हें उनके हथियारों समेत एक भारतीय ऑब्जर्वेशन पोस्ट को सौंप दिया था। दरअसल, एलएसी पर चीनी घुसपैठों में एक विचित्र पैटर्न भी देखने को मिलता है। जब भी कोई आधिकारिक यात्रा प्रस्तावित होती है या करीब आती है, तो एक व्यापक रूप से प्रचारित घटना सामने आने लगती है, जिसका उद्देश्य यह दिखाना होता है कि एलएसी कोई पारस्परिक रूप से मान्य सीमा नहीं है। 2013 में चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग की भारत यात्रा से पहले भी एक चीनी गश्ती दल पूर्वी लद्दाख में एलएसी के भारतीय हिस्से में 19 किलोमीटर अंदर तक आ गया था और राकी नाला के पास एक स्थान पर कब्जा कर लिया था। इससे भारतीय गश्ती दलों के लिए डेपसांग बुल्ज में प्रभावी ढंग से गश्त करना संभव नहीं रह गया था। बाद में चीन ने अपने सैनिक वापस बुला लिए। 2014 में शी जिनपिंग की यात्रा की पूर्व संध्या पर भी चीनी सैनिकों ने एलएसी पार की और विवादित क्षेत्र में सड़क बनाने की कोशिश की। दोनों पक्षों के सैकड़ों सैनिकों के बीच आमना-सामना हुआ और यह गतिरोध शी की भारत यात्रा के दौरान भी जारी रहा। 2019 में, जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के भारत के फैसले पर चीन ने नाराजगी जाहिर की थी। इसलिए, जब शी जिनपिंग, नरेंद्र मोदी के साथ दूसरे अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के लिए चेन्नई आए तो लद्दाख के पैंगोंग झील क्षेत्र में चीनी गश्त बढ़ गई और इसके परिणामस्वरूप भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई। अब फिर अगले महीने शी भारत आ सकते हैं और चीनी हरकतें नजर आने लगी हैं। इसके पीछे चीन के क्या मनसूबे होते हैं, यह समझ पाना मुश्किल है। नई दिल्ली के लिए यह समझना भी कठिन रहा है कि चेन्नई शिखर सम्मेलन के बाद चीन ने पूर्वी लद्दाख में भारतीय ठिकानों की नाकेबंदी आखिर क्यों की थी, जिसके परिणामस्वरूप गलवान में झड़प हुई। चीन एक और खेल खेल रहा है। 2017 से चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय ने अरुणाचल प्रदेश के स्थानों के अपने द्वारा दिए नामों की छह सूचियां जारी की हैं। अब तक 112 नाम घोषित किए जा चुके हैं। 7 अगस्त को हमने जवाब देते हुए 27 स्थानों के मानक नामों की घोषणा की तो चीन भड़क उठा। हकीकत यही है कि अरुणाचल के लोगों का तिब्बत के साथ कोई जातीय संबंध नहीं है। उसे दक्षिणी तिब्बत कहकर बदलकर चीन भले एक संदेश देना चाहता हो, लेकिन युद्ध शुरू करने के अलावा वह इस बारे में बहुत कुछ नहीं कर सकता। आज की स्थिति 1962 से बहुत अलग है। भारत के पास एक मजबूत सेना है, जो इस क्षेत्र की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है। हम एक परमाणु ताकत भी हैं। एलएसी पर चीनी घुसपैठों में एक विचित्र पैटर्न देखने को मिलता है। जब भी कोई आधिकारिक यात्रा होती है, तो ऐसी घटनाएं सामने आने लगती हैं, जिनका उद्देश्य यह दिखाना होता है कि एलएसी पारस्परिक रूप से मान्य सीमा नहीं है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)