सी.पी. राधाकृष्णन का कॉलम:पीढ़ियों को प्रेरित करने वाली असंख्य गाथाएं

Aug 15, 2026 - 06:43
सी.पी. राधाकृष्णन का कॉलम:पीढ़ियों को प्रेरित करने वाली असंख्य गाथाएं
भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के अवसर पर मैं प्रत्येक भारतवासी को हार्दिक बधाई देता हूं। साथ ही उन स्वतंत्रता सेनानियों को नमन करता हूं, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया। पिछले सप्ताह अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह की यात्रा के दौरान मुझे “हर घर तिरंगा’ अभियान के अंतर्गत राष्ट्रीय ध्वज फहराने तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा तिरंगा फहराए जाने की ऐतिहासिक स्मृति को नमन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह मेरे लिए अत्यंत भावुक और गौरवपूर्ण अनुभव था कि मैं उस धरती पर खड़ा था, जहां नेताजी की आजाद हिंद फौज ने 30 दिसंबर 1943 को तिरंगा फहराया था। इस अवसर ने मुझे सितंबर 1939 में नेताजी की मदुरै यात्रा का भी स्मरण कराया, जब वे स्वतंत्रता सेनानी पसुम्पोन मुथुरामलिंगा थेवर के निमंत्रण पर वहां पहुंचे थे। उस क्षण ने क्षेत्र के असंख्य देशभक्तों के हृदय में स्वतंत्रता की अलख जगा दी थी। अंडमान स्थित राष्ट्रीय स्मारक सेल्युलर जेल की मेरी यात्रा एक अन्य प्रेरणादायी क्षण रही। इसी जेल में भारत माता के महान सपूत वीर सावरकर, योगेंद्र शुक्ल, बटुकेश्वर दत्त, शचींद्र नाथ सान्याल और अनेक अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा कैद कर एकांत कारावास में रखा गया था। आज भी राष्ट्रीय स्मारक की ये दीवारें उन वीरों के साहस, उन्हें दी गई यातनाओं और सर्वोच्च बलिदान की गाथाएं सुनाती प्रतीत होती हैं, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया। 9 अगस्त को- जब हम भारत छोड़ो आंदोलन की स्मृति मना रहे थे- मुझे अंडमान द्वीप समूह में “हर घर तिरंगा’ अभियान का शुभारंभ करने का अवसर प्राप्त हुआ। 1942 में महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान करते हुए राष्ट्र को “करो या मरो’ का ओजस्वी नारा दिया था। इस आह्वान के परिणामस्वरूप पूरे देश में आजादी प्राप्त करने की प्रबल आकांक्षा व्याप्त हो गई थी। आज हमें उसी स्वतंत्रता सेनानी पीढ़ी के कारण स्वतंत्रता की हवा में सांस लेने और लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत संवैधानिक अधिकारों के साथ जीवन जीने का सौभाग्य प्राप्त है, जिन्होंने अपने समय की औपनिवेशिक शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष किया। स्वतंत्रता सेनानी चाहे उत्तर में कश्मीर से हों या दक्षिण में तमिलनाडु से, पश्चिम में गुजरात से हों या पूर्व में असम से- सभी क्षेत्रों, वर्गों, आयु समूहों के लोगों ने स्वतंत्रता के साझा लक्ष्य के लिए एकजुट होकर संघर्ष किया था। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रतिरोध की अमर प्रतीक बनीं रानी लक्ष्मीबाई का शौर्य, मंगल पांडे का साहस और बाल गंगाधर तिलक का वह निर्भीक उद्घोष- “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा’- स्वतंत्रता की ओर बढ़ते राष्ट्र के प्रत्येक कदम को शक्ति प्रदान करता रहा। इसी क्रम में वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै ने भारत का पहला स्वदेशी पोत-परिवहन उद्यम शुरू कर औपनिवेशिक शासन के आर्थिक प्रभुत्व को चुनौती दी। इससे यह सिद्ध हुआ कि स्वतंत्रता का संघर्ष केवल रणभूमि तक सीमित नहीं था, बल्कि आर्थिक और व्यावसायिक क्षेत्र में भी लड़ा गया था। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की क्रांतिकारी भावना ने आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता के लिए त्याग और बलिदान का मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी। वहीं रानी गैदिनल्यू की अदम्य भावना ने पूर्वोत्तर भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रतिरोध की लौ प्रज्वलित रखी। असम की युवा वीरांगना कनकलता बरुआ भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व करते हुए हाथों में राष्ट्रीय ध्वज लेकर अदम्य साहस के साथ आगे बढ़ीं और अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। बिरसा मुंडा तथा अनेक जनजातीय नेताओं ने भी औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध ऐतिहासिक प्रतिरोध का नेतृत्व किया। इस स्वतंत्रता दिवस पर मैं तिरुप्पुर कुमारन को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं, जिन्हें लोकप्रिय रूप से कोडी काथा कुमारन अर्थात ध्वज की रक्षा करने वाले कुमारन के नाम से जाना जाता है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मेरे पैतृक स्थान तिरुप्पुर में उन्होंने आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। मृत्यु निकट जानते हुए भी उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को धरती पर नहीं गिरने दिया था। कम उम्र में ही कुमारन के हृदय में देशभक्ति की लौ प्रज्वलित हो उठी थी। महात्मा गांधी के आदर्शों से प्रभावित होकर कुमारन ने लोगों, विशेषकर युवाओं में राष्ट्रवाद की भावना जगाने के लिए देशबंधु युवा संघ की स्थापना की। कुमारन का विश्वास था कि सच्ची स्वतंत्रता तभी प्राप्त की जा सकती है, जब लोग औपनिवेशिक शासन के अन्याय के प्रति जागरूक हों और उसके विरुद्ध संघर्ष करने का साहस तथा दृष्टि विकसित करें। 10 जनवरी 1932 को सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान कुमारन ने एक जुलूस का नेतृत्व किया। हाथों में राष्ट्रीय ध्वज थामे वे कुछ साथियों के साथ आगे बढ़े और तिरुप्पुर की सड़कों पर वंदे मातरम् के जोशीले नारे गूंज उठे। औपनिवेशिक शक्तियों ने इस समूह पर हमला कर दिया। वंदे मातरम् का उद्घोष करते हुए और राष्ट्रीय ध्वज को अपने शरीर से लगाए कुमारन के सिर पर गंभीर चोटें आईं और राष्ट्र के लिए उन्होंने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मृत्यु के समय उनकी आयु मात्र 27 वर्ष थी। जब मैं तिरुप्पुर कुमारन की आयु का उल्लेख करता हूं, तो मुझे उन अनेक युवाओं की याद आती है, जिन्होंने भारत माता के लिए अपने प्राण बलिदान कर दिए। मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस पहल की सराहना करता हूं, जिससे राष्ट्रीय आंदोलन के गुमनाम नायकों को देश के सामने लाया जा रहा है। मैं सभी ज्ञात और अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। इस ऐतिहासिक अवसर पर आइए, हम मातृभूमि के प्रति अपने दायित्वों पर चिंतन करें और अपनी प्रतिबद्धता पुनः दृढ़ करें। इस अमृतकाल में 2047 तक विकसित भारत के निर्माण के लिए स्वयं को समर्पित करें और राष्ट्र की प्रगति तथा समृद्धि के लिए मिलकर कार्य करें। इतिहास के पन्नों में ऐसी असंख्य गाथाएं हैं, जो साहस, संघर्ष, धैर्य और दृढ़ संकल्प से भरी हैं। वे याद दिलाती हैं कि स्वतंत्रता अनगिनत वीरों के सामूहिक संकल्प से प्राप्त हुई थी और उनकी विरासत आज भी प्रेरित करती है। जय हिंद! भारत माता अमर रहे!