रश्मि बंसल का कॉलम:किसी को खरोंच मार के नहीं, अपने दम पर ही सफलता पाइए
कई साल मेरे पास लाइसेंस था, पर ड्राइव नहीं करती थी। डर लगता था। इस देश की सड़कों पर गाड़ी चलाना मतलब आप एक वीडियो गेम के किरदार से कम नहीं। कभी भी, कहीं से भी खतरा आ सकता है। कोई लेफ्ट से राइट टर्न लेना चाहता है, तो कोई गलत दिशा में चला रहा है। जिसको जान प्यारी है, उसे डर तो लगेगा ही! खैर, बेटी ने मुझे बढ़ावा दिया। तो फिर मैंने हिम्मत की और चलाना शुरू किया। 2014 में जो गाड़ी खरीदी थी, उसने अब लगभग 50,000 किमी तय लिए हैं। और हां, किसी ड्राइवर नहीं, मेरे ही हाथ से चली है। यह कमाल कैसे हुआ? पहली बात- मन को वश में किया। गाड़ी निकालने के पहले भगवान का नाम जरूर लेती हूं कि हे परमात्मा मेरी रक्षा करना। छोटी-मोटी टक्कर हुई है, तीन बार। एक मेरी गलती से, बाकी दूसरे से। मगर मैंने कभी झगड़ा नहीं किया। थोड़ा पैसा लगेगा, ठीक है। नहीं तो इंश्योरेंस से क्लेम कर लेंगे। मैं भी ठीक, आप भी ठीक, चलो शुक्र है। इस तरह पीस ऑफ माइंड बना रहा। हां, मैं गाड़ी अच्छी भी चलाती हूं, और ध्यान से भी। कोई ओवरटेक करना चाहता है तो मैं सोचती हूं- करने दो। इसमें ईगो नहीं लाती। वैसे कई बार वही गाड़ी अगले सिग्नल पर खड़ी हुई मिलती है। और मैं आराम से अपना गाना सुनते-सुनते उसी मुकाम पर पहुंच गई जिसके लिए वो उतावले हो रहे थे। वैसे सड़क पर मुझे दूसरी गाड़ियों से नहीं, टू व्हीलर से खतरा लगता है। खासकर बाइक चलाने वालों से। वो धुरंधर बन कर पाकिस्तान एंटर नहीं कर पाए। इसलिए अब, दो गाड़ियों के बीच पांच सेंटीमीटर की खाली जगह में घुसने का शौक रखते हैं। चाहे मेरी गाड़ी में खरोंच लगे, उन्हें क्या परवाह। बाइक वाले भी दो वैरायटी के होते हैं। एक होते हैं- ‘यंग गन्स’। रो-धो कर मम्मी-पापा से बाइक मिली तोहफे में, या ईएमआई शुरू की अपनी पहली कमाई से। सोचा था सड़क पर धूम मचाएंगे, लेकिन फंस गए ट्रैफिक में। लड़कियों को घुमाने का चांस तो मिला, पर उन्हें बिठा दिया बिना हेलमेट के। दूसरी कैटेगरी में है- ‘परेशान प्राणी’। उसकी उम्र हो गई है चालीस से ऊपर पर जीवन की दौड़ में कहीं वो थोड़ा पीछे रह गया है। वो बाइक यूज करता है भागम-भाग के लिए। घर से पांच मिनट लेट निकला था, शायद इधर-उधर बाइक घुसा कर टाइम से पहुंच जाऊं। फिर देखता है, ड्राइवर वाली गाड़ी में बैठा हुआ इंसान। जो आराम से ऑफिस पहुंचने के पहले अखबार पढ़ रहा है, या लैपटॉप पर काम कर रहा है। गुस्सा तो आता है। अगर इसकी महंगी गाड़ी पर दो-चार खरोंच लग जाएं, तो अच्छा होगा। क्या कर लेगा, मैं तो फरार। वैसे सच है कि टू व्हीलर और फोर व्हीलर में टक्कर हो जाए तो चौपहिया वाले की ही गलती मानी जाती है। चाहे बाइक वाला कितनी भी बेवकूफी से चला रहा हो। क्योंकि सड़क पर बेचारा गिरा पड़ा है, देखो- चोट तो नहीं लगी! सहानुभूति मिलती है कमजोर इंसान को। खैर, सड़क से हमारा कैरेक्टर पता चलता है। जर्मनी में हाईवे पर स्पीड लिमिट नहीं पर हर कोई नियम का पालन करता है। हमारे देश में इधर-उधर कोने काट कर ही काम होता है, इसलिए सड़क पर भी वही हाल है।
वैसे बढ़िया बात यह कि बड़े शहरों में अब मेट्रो की सुविधा आ गई है। सबसे विकसित देश वो, जहां छोटा-बड़ा हर इंसान पब्लिक ट्रांसपोर्ट में जाना पसंद करता है। क्योंकि उसमें रफ्तार है, और आराम भी। अपनी कार या बाइक आप रखेंगे, थोड़ा घूमने-फिरने के लिए। भाग-दौड़ के लिए नहीं। अंत में कहूंगी, जीवन के रास्ते में टू-व्हीलर सोच मत अपनाइए। किसी और को खरोंच मार के नहीं, अपने दम पर सफलता पाइए।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)