विराग गुप्ता का कॉलम:हमारे पुलिस-तंत्र में जरूरी सुधारों का समय आ गया है

May 27, 2026 - 06:10
विराग गुप्ता का कॉलम:हमारे पुलिस-तंत्र में जरूरी सुधारों का समय आ गया है
कॉकरोच वाले मामले की जड़ में गवर्नेंस की विफलता के साथ मंत्री, अफसर, पुलिस, जज और वकीलों के किरदार शामिल हैं। इस पिरामिड की सबसे अहम कड़ी पुलिस है। ट्विशा शर्मा मामले में भी पीड़िता के परिजनों को एफआईआर दर्ज कराने के लिए कई दिनों तक प्रदर्शन करना पड़ा। मीडिया में हल्ले के बाद जिला अदालत, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट सभी जगहों पर सुनवाई होने लगी। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की पीठ के सामने सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि रिटायर्ड जिला जज पुलिस जांच में सहयोग नहीं कर रही हैं। जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर पक्ष-विपक्ष शासित सभी राज्यों में सरकारी इशारे पर पुलिस की कार्रवाई या चुप्पी निर्धारित होना संवैधानिक व्यवस्था का सबसे बड़ा अभिशाप है। कानपुर में कार्रवाई का दबाव बनाने के लिए आईटीबीपी के सशस्त्र जवानों ने पुलिस कमिश्नर कार्यालय का घेराव ही कर लिया। पंजाब में बागी सांसदों के खिलाफ पुलिस उत्पीड़न को रोकने के लिए हाईकोर्ट को आदेश देना पड़ा। लेकिन सबसे दिलचस्प मामला पश्चिम बंगाल का है। मुख्यमंत्री के पीए की हत्या के मामले में पुलिस ने एक बेकसूर आदमी को गिरफ्तार कर लिया, जिसे अब सीबीआई की अर्जी के बाद अदालत ने बरी कर दिया है। संविधान के प्रति भरोसा बनाए रखने के लिए पुलिस उत्पीड़न को रोकना जरूरी है। इसके लिए इन तीन पहलुओं से पुलिसिंग में संरचनात्मक सुधारों को लागू करने की जरूरत है। जांच : ममता सरकार के समय पांच साल पहले हुई चुनावी हिंसा के मामलों में पुलिस ने कार्रवाई नहीं की थी। अब नए मुख्यमंत्री के आदेश के बाद बंद किए गए 59 मामलों को दोबारा खोलने के साथ 181 नई एफआईआर दर्ज की गई हैं। बंगाल और दूसरे राज्यों से साफ है कि नेताओं और पुलिस के गठजोड़ के आगे न्यायिक व्यवस्था बौनी और विफल साबित हो रही है। दरअसल एफआईआर दर्ज करने या नहीं करने, जांच को मनमाफिक दिशा में बढ़ाने, गिरफ्तारी और रिहाई के लिए पुलिस के पास आज असीमित अधिकार हो गए हैं। चर्चित मामलों में तो सीबीआई जांच और सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान की बुलेट ट्रेन, वहीं दूसरी तरफ आम जनता के लिए बैलगाड़ी न्याय की बदहाल हकीकत है। पुलिस और सरकारों की ज्यादती के मामलों में अदालत से जल्द और सही न्याय नहीं मिलने से संविधान के प्रति भरोसा कमजोर होता है। इससे लोगों में गुस्सा भी बढ़ रहा है। दुरुपयोग : जोगिंदर कुमार फैसले में 1994 में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस वेंकटचलैया ने बेवजह की गिरफ्तारियों को रोकने का आदेश दिया था। अर्नेश कुमार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में कहा था कि बेवजह की गिरफ्तारियों के लिए पुलिस के साथ अदालतें भी जवाबदेह हैं। संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम कोर्ट के फैसले कानून की तरह बाध्यकारी माने जाते हैं। झूठे मुकदमों में आरोपी को जमानत देने के साथ अधिकारों का दुरुपयोग करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की अवमानना का मामला चलना चाहिए। सुधार : पुलिस को जवाबदेह बनाना होगा। केरल में नई कांग्रेसनीत सरकार ने 484 थानों में स्वच्छता, जवाबदेही और संवेदनशीलता बढ़ाने की पहल के साथ पुलिस सुधारों के लिए समिति का गठन किया है। संविधान के अनुसार पुलिस का विषय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में है, जबकि 3 नए आपराधिक कानून केंद्र सरकार ने लागू किए हैं। सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों, प्रशासनिक सुधार आयोग और विधि आयोग की अनेक रिपोर्टों के अनुरूप राज्यों को केंद्र के सहयोग से पुलिस सुधार, जेलों का आधुनिकीकरण और न्यायिक प्रशासन के लिए ज्यादा वित्तपोषण करने की जरूरत है। नेताओं और पुलिस के गठजोड़ के आगे न्याय-व्यवस्था विफल साबित हो रही है। एफआईआर दर्ज करने या नहीं करने, जांच को वांछित दिशा में बढ़ाने, गिरफ्तारी और रिहाई के लिए आज पुलिस के पास असीमित अधिकार हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)