सुधींद्र मोहन शर्मा का कॉलम:कहीं ग्रीन एनर्जी भी "रिबाउंड इफेक्ट' से मुश्किलें ना पैदा कर दे?
पिछले कुछ वर्षों में भारत के शहरों और कस्बों का दृश्य तेजी से बदला है। लगभग हर नई कॉलोनी की छत पर सोलर पैनल दिखाई देते हैं, घरों में एसी सामान्य हो चुके हैं, गहरे नलकूप लगातार खोदे जा रहे हैं और आधुनिक जीवनशैली की सुविधाएं प्रगति का प्रतीक मानी जा रही हैं। ऊपर से यह परिवर्तन सकारात्मक लगता है। छतों पर स्थापित सौर ऊर्जा प्रणालियों को स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत माना जाता है, ऊर्जा दक्ष उपकरणों को पर्यावरण हितैषी बताया जाता है और आधुनिक उपकरणों को जीवन को आसान बनाने वाला साधन माना जाता है। लेकिन यदि हम पूरे परिदृश्य को गहराई से देखें तो एक गंभीर प्रश्न सामने आता है- क्या हम वास्तव में पर्यावरण पर दबाव कम कर रहे हैं या केवल अपने बढ़ते उपभोग को "ग्रीन' नाम देकर उसे उचित ठहराने लगे हैं? आज दुनिया के पर्यावरण वैज्ञानिक और ऊर्जा विशेषज्ञ "रिबाउंड इफेक्ट' की बात कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि जब कोई तकनीक ऊर्जा को सस्ता, आसान या अधिक दक्ष बना देती है, तब लोग उसका उपयोग कम करने के बजाय और अधिक करने लगते हैं। उदाहरण के लिए, किसी घर में सौर पैनल लगने के बाद एसी अधिक देर तक चलने लगते हैं, अतिरिक्त उपकरण खरीदे जाते हैं और कुल ऊर्जा खपत पहले से अधिक हो जाती है। तकनीक से हुई बचत बढ़े हुए उपभोग में समाप्त हो जाती है। भारत में यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती दिखाई देने लगी है। सरकार द्वारा छतों पर सौर ऊर्जा प्रणालियों को प्रोत्साहन देने के बाद लाखों घर इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह आवश्यक भी है, क्योंकि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना जरूरी है। भारत में मार्च 2026 तक ग्रिड से जुड़े रूफटॉप सौर ऊर्जा संयंत्रों की कुल स्थापित क्षमता 26-27 गीगावॉट तक पहुंच चुकी है। इनमें घरेलू क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ रही है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार 2025 में जो नई रूफटॉप क्षमता जुड़ी, उसमें लगभग 75% से अधिक हिस्सा घरेलू उपभोक्ताओं का था। यदि औसतन भारत में सौर संयंत्र प्रतिदिन 4 से 5 घंटे पूर्ण क्षमता के बराबर उत्पादन करें, तो घरेलू रूफटॉप सौर प्रणालियां ही प्रतिवर्ष 15 से 20 अरब यूनिट (किलोवाट-घंटा) बिजली उत्पन्न कर रही हैं। यह मात्रा कई मध्यम आकार के ताप विद्युत संयंत्रों के वार्षिक उत्पादन के बराबर है। लेकिन क्या यह ऊर्जा जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम कर रही है या इसका बड़ा हिस्सा बढ़ती एसी-कल्चर, जल-दोहन और संसाधन-प्रधान जीवनशैली को ही ऊर्जा प्रदान कर रहा है? यदि सौर ऊर्जा का उपयोग संयमित उपभोग के बजाय असीमित सुविधा-विस्तार के लिए होने लगे, तो ग्रीन एनर्जी भी प्रकृति पर बढ़ते दबाव का जरिया बन जाएगी। जब लोगों को लगता है कि बिजली अब मुफ्त है, तो उसके उपयोग में संयम समाप्त होने लगता है। विशेष रूप से एसी इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। कुछ वर्ष पहले तक एसी केवल बड़े शहरों और सम्पन्न वर्ग तक सीमित थे, लेकिन अब छोटे शहरों और कस्बों में भी इनका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण इनकी आवश्यकता से इनकार भी नहीं किया जा सकता, लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है, जब सुविधा आवश्यकता से आगे बढ़कर जीवनशैली का प्रतीक बन जाती है। एसी केवल बिजली ही नहीं खर्च करता, वह शहरों के तापमान को भी प्रभावित करता है। एसी कमरे के अंदर की गर्मी बाहर फेंकते हैं, जिससे बाहरी वातावरण और गर्म होता है। घनी आबादी वाले क्षेत्रों में हजारों एसी मिलकर हीट आइलैंड इफेक्ट उत्पन्न करते हैं, जहां शहर का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से कई डिग्री अधिक हो जाता है। विडम्बना यह है कि बढ़ती गर्मी से बचने के लिए हम अधिक एसी चलाते हैं, और अधिक वातानुकूलन शहरों को और गर्म बना देता है। हम समाधान के माध्यम से ही समस्या को बढ़ा रहे हैं। पिछले कुछ दशकों में मानव समाज ने हर समस्या का तकनीकी समाधान खोजने की कोशिश की है। गर्मी बढ़ी तो एसी लगा लिया, बिजली महंगी हुई तो सौर ऊर्जा प्रणाली लगा ली, पानी कम हुआ तो और गहरे नलकूप खोद लिए। लेकिन हमने शायद ही कभी अपने उपभोग के स्वरूप पर प्रश्न उठाया हो।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)