आशुतोष वार्ष्णेय का कॉलम:लोकतंत्र केवल चुनावों तक ही सीमित नहीं हो सकता है
लोकतंत्र के सिद्धांतकार लंबे समय से मानते रहे हैं कि भारत का लोकतंत्र असाधारण रहा है। इससे पहले अमीर और औद्योगिक देशों में ही लंबे समय तक लोकतंत्र बना रहा था। आजादी के बाद कई दशकों तक भारत गरीब और बहुत कम औद्योगीकृत था, फिर भी वह लोकतांत्रिक बना रहा। यह चकित करता था, क्योंकि भारत में लोकतंत्र के लंबे समय तक टिके रहने की संभावना बहुत कम मानी जाती थी। 1966 में बैरिंगटन मूर जूनियर- जो ‘सोशल ओरिजिन्स ऑफ डिक्टेटरशिप एंड डेमोक्रेसी’ किताब के लेखक थे- ने कहा था : …एक राजनीतिक प्रजाति के रूप में भारत आधुनिक दुनिया का हिस्सा है। 1964 में नेहरू की मृत्यु के समय राजनीतिक लोकतंत्र को 17 साल हो चुके थे। अगर यह अपूर्ण था, तो भी यह सिर्फ दिखावे का लोकतंत्र नहीं था। एशियाई माहौल में और औद्योगिक क्रांति के बिना राजनीतिक लोकतंत्र काफी अजीब लग सकता है। इसके बाद 1989 में आधुनिक लोकतांत्रिक सिद्धांत के संस्थापक रॉबर्ट डाल ने लिखा कि भारत आज के समय का एक प्रमुख अपवाद था। आखिर में, 2001 में एडम प्रेजेवोर्स्की ने लिखा : भारत में लोकतंत्र के खिलाफ संभावनाएं बेहद ज्यादा थीं। लेकिन यह दावा मुख्य रूप से भारत के चुनावी लोकतंत्र पर ही लागू होता है। भारत ने उदार लोकतंत्र के रूप में उतना अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है। उदार लोकतंत्र और चुनावी लोकतंत्र दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। उदार लोकतंत्र का दायरा व्यापक है, क्योंकि सिर्फ चुनाव ही लोकतंत्र के सभी पहलुओं को पूरा नहीं करते। ये सच है कि स्वतंत्र मुकाबले वाले चुनाव और सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार नहीं हो, तो आधुनिक लोकतंत्र संभव नहीं है। यह एक जरूरी शर्त है। लेकिन लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं है। उदार लोकतंत्र की अवधारणा में यह भी शामिल है कि चुनी हुई सरकारें चुनावों के बीच कैसे काम करती हैं। एक उदार लोकतंत्र हमेशा नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है, खासकर बोलने की आजादी और संगठन बनाने की आजादी की, जिसे आज के समय में सिविल सोसायटी कहा जाता है। उतना ही महत्वपूर्ण यह है कि उदार लोकतंत्र अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करता है। तर्क यह है कि बहुसंख्यक अपनी संख्या के आधार पर खुद की रक्षा कर सकते हैं, लेकिन अल्पसंख्यकों के पास इतनी संख्या नहीं होती। इसलिए अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के बिना लोकतंत्र सिर्फ बहुसंख्यकों की ताकत बन सकता है। अगर बोलने की आजादी और नागरिकों के स्वतंत्र रूप से गैर-सरकारी संगठन बनाने के अधिकार की रक्षा न हो, तो चुनावी लोकतंत्र एक कठोर सत्तावादी ताकत भी बन सकता है। भारत का चुनावी लोकतंत्र तो काफी मजबूत बना रहा, लेकिन इसकी राजनीतिक व्यवस्था की उदारता में समय के साथ गिरावट आई है, क्योंकि बोलने की आजादी, सिविल सोसायटी और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमले हुए हैं। पहले उदार लोकतंत्र कमजोर हुआ, अब चुनावी लोकतंत्र का कमजोर होना भी शुरू हुआ। व्यावहारिक रूप से एसआईआर नागरिकों के वोट देने के अधिकार पर प्रहार ही है। इसमें दो बातें काम कर रही हैं : एक, वोट देने की पात्रता के लिए दस्तावेजों का पर्याप्त होना जरूरी मानना। दो, रजिस्ट्रेशन की जिम्मेदारी नागरिकों पर डालना, जबकि परंपरागत रूप से यह सरकार की जिम्मेदारी रही है।
अमेरिका में- जहां वोट देने की पात्रता के लिए दस्तावेजों के पर्याप्त होने की अवधारणा शुरू हुई थी- एसआईआर जैसे विचार को सिद्धांत रूप में "वोटर सप्रेशन' यानी मतदाताओं को वोट देने से रोकना कहा जाता है। ऐतिहासिक रूप से अश्वेत और गरीब हिस्पैनिक मतदाता इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। तो लोकतांत्रिक गिरावट का सामना अमेरिका भी कर रहा है। उदार लोकतंत्र और चुनावी लोकतंत्र दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। उदार लोकतंत्र का दायरा व्यापक है, क्योंकि सिर्फ चुनाव ही लोकतंत्र के सभी पहलुओं को पूरा नहीं करते। हां, ये जरूर सच है कि स्वतंत्र चुनावों के बिना आधुनिक लोकतंत्र संभव नहीं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)