एन. रघुरामन का कॉलम:ट्रेन के कोच से होटल की लॉबी तक ‘सेकंडहैंड स्मोक’ पर बहस उभर रही है
रेल यात्रा के दौरान हाउसकीपिंग स्टाफ के कम्पार्टमेंट साफ करने के बाद यदि आप गहरी सांस लें तो हो सकता है कि आपको हाई-एंड होटलों जैसी चंदन, लेदर, सौंफ, इलायची, वायलेट या सीडर जैसी खुशबू न मिले। इसके बजाय वहां फ्लोरल, सिट्रस या फ्रेश एक्वा जैसी हल्की खुशबू हो सकती है। हममें से कई लोगों ने इसे अनुभव किया होगा। इंडियन रेलवे की ऑन-बोर्ड हाउसकीपिंग सर्विस (ओबीएचएस) पॉलिसी गाइडलाइंस में एसी कोचों और एग्जीक्यूटिव क्लास के लिए सफाई की एक प्रक्रिया अनिवार्य की गई है। पैसेंजर कम्फर्ट के लिए इसमें एक सख्त सीक्वेंस रखा गया है। इस क्लीनिंग रूटीन में कचरा सफाई, सूखा व गीला पोंछा और टॉयलेट की डीप-क्लीनिंग शामिल हैं। जब फिजिकल क्लीनिंग पूरी हो जाए तो हाउसकीपिंग स्टाफ को एसी कोचों में एयर फ्रेशनर स्प्रे करना होता है। यह मैनुअल प्रोसेस क्रमवार की जाती है, हालांकि कुछ आधुनिक कोचों में अब ऑटोमेटेड फ्रेगरेंस डिस्पेंसर (एएफडी) लगाए जा रहे हैं। इसे ओडर कंट्रोल प्रोटोकॉल कहते हैं। इसकी गाइडलाइंस में पहले वेस्टिब्यूल और टॉयलेट वाले हिस्सों में मॉस्किटो रिपेलेंट या सैनिटाइजिंग स्प्रे करने और उसके बाद यात्रियों की सीट या बर्थ वाले हिस्सों में खुशनुमा रूम डियोडोरेंट छिड़कने की सलाह दी गई है, ताकि हवा की गुणवत्ता बेहतर बनी रहे। कई वर्षों से रेलवे ने खुशबू को पैसेंजर एक्सपीरियंस का अहम हिस्सा माना है। सफाई का अर्थ सिर्फ यह नहीं कि पैसेंजर क्या देखते हैं, बल्कि यह भी है कि वे क्या सूंघते हैं। पैसेंजर के ट्रेन में चढ़ते ही हल्की, फ्रेश फ्लोरल या एक्वाटिक अरोमा हाई-हाइजीन और क्लिनिकल केयर का सेंसेरी इम्प्रेशन देता है। लेकिन अगर ये खुशबू कुछ लोगों को बीमार करने लगें तो क्या होगा? क्या ऐसे लोगों को भेदभाव का पीड़ित माना जाएगा? कैलिफोर्निया की एक फर्म यही कहती है और उसने इस साल ऐसा करने वाले हाई-एंड होटलों के खिलाफ कई मुकदमे दायर किए हैं। यह विवाद सिंथेटिक सेंट्स को लेकर उभरती बहस को हाईलाइट करता है। कई लोग अब इस अरोमा को ‘सेकंडहैंड स्मोक’ कहने लगे हैं! लास वेगास के विलियम एफ हराह कॉलेज ऑफ हॉस्पिटैलिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर जूलियाना आरवी ट्कैच कहती हैं कि ‘गंध अच्छी हो या बुरी, लेकिन ये बहुत-सी चीजों को ट्रिगर कर सकती हैं।’ ट्कैच एक्सपीरियंस डिजाइन, इवेंट्स और थीम पार्क्स में विशेषज्ञता रखती हैं। उनका कहना है कि सेंट को मार्केटिंग टूल के तौर पर इस्तेमाल करना नई बात नहीं है। लेकिन अब फर्क यह है कि उन्नत टेक्नोलॉजी की मदद से सिंथेटिक खुशबू को बड़े पैमाने पर ऐसे तरीके से फैलाया जा रहा है, जो चतुराईभरा और सतत है। ऊपर बताए गए एएफडी को ही याद कीजिए। यहीं से इस साल मई में विवाद शुरू हुआ, जब अमेरिकी लॉ फर्म ‘कोल एंड वैन नोट’ ने फ्रेगरेंस सेंसिटिविटी वाले होटल कस्टमर्स की ओर से कई क्लास-एक्शन मुकदमे दायर किए। इन मामलों में दावा किया गया है कि होटल ‘अमेरिकन्स विद डिसएबिलिटीज एक्ट (एडीए)’ का उल्लंघन कर रहे हैं। कोर्ट में फाइल किए दस्तावेजों में फर्म ने कहा है कि 26.8% वयस्क अस्थमा जैसी समस्याओं से और 27.5% लोग केमिकल सेंसिटिविटी से पीड़ित हैं। जब कोई सर्विस प्रोवाइडर सेंट डिस्पेंसिंग मशीनों या एएफडी के जरिए सिंथेटिक खुशबू फैलाता है तो शायद वो टॉक्सिक केमिकल फैला रहा होता है। इससे संवेदनशील गेस्ट या पैसेंजर्स में सांस की तकलीफ, सिरदर्द, स्किन इरिटेशन और यहां तक कि गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल, कार्डियोवैस्कुलर और कॉग्निटिव समस्याएं भी हो सकती हैं। फर्म का यह कैंपेन आगे बढ़ा है और पहले ड्रॉप किए गए कुछ मामलों को कैलिफोर्निया स्टेट कोर्ट्स में री-फाइल किया जा रहा है। दूसरी ओर, होटल एसोसिएशन की वेबसाइट कहती है कि ‘चालबाज वकीलों ने एडीए का इस्तेमाल हथियार की तरह किया है। वे पहले कानून के अस्पष्ट उल्लंघन का आरोप लगाते हैं और फिर आसान सेटलमेंट के नाम पर पैसा ऐंठना चाहते हैं।’ एंबिएंट सेंटिंग को लेकर बढ़ता वैश्विक टकराव एक बहस खड़ी करता है कि सच्ची हॉस्पिटैलिटी ऐसे साझा सेंसेरी डिसकंफर्ट पर आधारित नहीं हो सकती। साझा पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में सफाई की परिभाषा यह होनी चाहिए कि डीप सैनिटाइजेशन और मैकेनिकल वेंटिलेशन के जरिए गंदगी और बदबू को प्रमाणित तौर पर हटाया जाए, न कि सिंथेटिक परफ्यूम को जबरन बनाए रखा जाए। फंडा यह है कि असल प्रोग्रेस ऐसा साझा वातावरण डिजाइन करने में हैं, जिसमें हर व्यक्ति आसानी से सांस ले सके और यह सुनिश्चित करने में है कि हमारे द्वारा साझा की जाने वाली हवा सुरक्षित, इनक्लूसिव और सभी की पहुंच में हो।