एन. रघुरामन का कॉलम:व्यवहार में बदलाव लाने के लिए हमें लोगों को डराना चाहिए या पुरस्कृत करना चाहिए?

Oct 9, 2026 - 08:00 - 08:00  551
एन. रघुरामन का कॉलम:व्यवहार में बदलाव लाने के लिए हमें लोगों को डराना चाहिए या पुरस्कृत करना चाहिए?
इस हफ्ते की शुरुआत में पोस्ट किया गया साढ़े दस मिनट का वह वीडियो मेरे लिए बहुत असामान्य था। वजह थी कि इसे पोस्ट करने वाला व्यक्ति 1 अक्टूबर को ही नियुक्त हुआ है और उनका वीडियो तत्काल ही वायरल हो गया। ये व्यक्ति अमेरिका में इलिनॉय राज्य के कार्यवाहक लेजिस्लेटिव इंस्पेक्टर जनरल डेविड ई. रिस्ली थे। उनका ऑफिस लेजिस्लेटिव ब्रांच में धोखाधड़ी, बर्बादी, दुरुपयोग, कुप्रबंधन, कर्तव्य का निर्वहन न करने या उसे गलत या गैरकानूनी तरीके से करने और ‘स्टेट ऑफिशियल एंड एम्प्लॉइज एथिक्स एक्ट’ के उल्लंघन से जुड़ी शिकायतों की जांच करता है। उनके अधिकार क्षेत्र में इलिनॉय जनरल असेंबली के वर्तमान और पूर्व सदस्य तथा लेजिस्लेटिव ब्रांच के वर्तमान और पूर्व राज्य कर्मचारी आते हैं। उनका मुख्य काम नैतिकता से जुड़ी शिकायतों और गलत आचरण के आरोपों की बिना किसी राजनीतिक पक्षपात के पूरी और स्वतंत्र जांच करना है। वीडियो में वे कहते दिख रहे हैं कि ‘पहली बात, आपके व्यवहार के बारे में हमेशा किसी को पता होता है और कोई इस बारे में किसी दूसरे से बात जरूर करेगा। देर-सबेर खबर हमारे ऑफिस तक पहुंच जाएगी। दूसरी बात, जब ये बात हमारे कानों में पड़ेगी तो भले ही आप इन्वेस्टिगेटिव ऑफिसर हों, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। हमने आपसे कहीं बड़ी मछलियों की जांच सफलतापूर्वक की है। इसलिए इस बारे में सोचिए और अच्छे इंसान की तरह व्यवहार कीजिए।’ उन्होंने यह कहते हुए बात खत्म की कि ‘उल्लंघन बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे... इसलिए समस्या के मूक दोषी बनने के बजाय समाधान का हिस्सा बनिए।’ याद रखिए, वे पहली बार अपने स्टाफ से बात कर रहे थे। यह वीडियो देखते हुए मैं पुणे के सदाशिव पेठ में तिलक रोड स्थित दुर्वांकुर डाइनिंग हॉल में पहुंचा, जो खास महाराष्ट्रीयन भोजन के लिए जाना जाता है। यहां थालीपीठ से लेकर दही वड़ा, पूरन पोली से लेकर श्रीखंड, बासुंदी, रबड़ी और सीजनल आमरस तक मिलता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट के लिए चपाती और भाकरी, दाल-खिचड़ी और मशहूर महाराष्ट्रीयन आमटी के साथ विभिन्न सूखी और रसेदार सब्जियां भी परोसी जाती हैं। इसकी एक अनोखी डिस्काउंट पॉलिसी है। चूंकि वे नहीं चाहते कि लोग खाना बर्बाद करें, इसलिए यदि कोई प्लेट की हरेक चीज समाप्त करता है तो उसे बिल में 20 रुपए की छूट मिलती है। मिनी मील की कीमत 235 रुपए है, जो वीक-डेज में 300 रुपए और वीकेंड पर 450 रुपए तक पहुंच जाती है। अलग-अलग दिनों में अलग-अलग थालियां परोसी जाती हैं। इनमें संडे और हॉलिडे स्पेशल विशेष बड़ी थाली और गणेश चतुर्थी का विशेष मेन्यू भी शामिल हैं। विख्यात तौर पर यहां की सर्विस तेज और टर्नओवर काफी ज्यादा है। यह ट्रेडिशनल महाराष्ट्रीयन डाइनिंग हॉल कल्चर को बताता है, जिसमें सर्वर्स लगातार प्लेट में खाना परोसते रहते हैं और खाने वाले भी तेजी से खाते हैं। चूंकि हम भोजन की नहीं, व्यवहार की बात कर रहे हैं तो वहां मैंने जो देखा, वह बताता हूं। सिर्फ दो लोगों को छोड़कर मेरे आसपास बैठे सभी लोगों ने प्लेट में रखी हर चीज खाई, क्योंकि वे 20 रुपए की छूट लेना चाहते थे। कुछ लोग डकार लेकर इस पर हंसे भी, लेकिन वे कोई भी चीज वेस्ट नहीं करना चाहते थे। अब मेरा सवाल है कि जब कोई व्यक्ति करीब 300 रुपए खर्च कर रहा है तो महज 20 रुपए से वाकई कोई फर्क पड़ेगा? फिर भी ज्यादातर लोग छूट पाने के लिए एक दाना भी वेस्ट नहीं करना चाहते थे।इससे मैं एक बड़े सवाल पर सोचने को मजबूर हुआ कि इंसान के बर्ताव को ज्यादा प्रभावी ढंग से क्या बदलता है- सजा का डर या इनाम का आकर्षण? रिस्ली ने अपने स्टाफ को व्यवहार ठीक रखने के लिए पकड़े जाने और जांच होने का डर दिखाया। दुर्वांकुर खाने वालों को हर निवाले की कीमत समझाने के लिए 20 रुपए के इनाम का उपयोग करता है। दोनों तरीके कारगर हैं, लेकिन दूसरा वाला एक सुखद अनुभव देकर जाता है। जब लोग जानबूझकर मर्यादा उल्लंघन करें तो शायद सजा जरूरी होती है, लेकिन जब उद्देश्य अच्छी आदत बनाना हो तो इनाम ज्यादा कारगर होता है। फंडा यह है कि अकसर हम लोगों को यह बताकर बदलने की कोशिश करते हैं कि अगर उन्होंने कुछ गलत किया तो उनके साथ क्या होगा। शायद हमें उन्हें यह भी बताना चाहिए कि सही काम करने पर उन्हें क्या मिलेगा। आखिरकार, डर हमें बात मानने को मजबूर कर सकता है, लेकिन इनाम हमें खुद में बदलाव के लिए प्रेरित कर सकता है।