डॉ. अरुणा शर्मा का कॉलम:पीछे लौटकर नगद भुगतान के दौर में जाना अब मुमकिन नहीं
वित्तीय क्षेत्र में डिजिटलीकरण के माध्यम से हमें कई सुविधाएं मिली हैं। इसके कारण ही क्लाइंटों के खाते मेंटेन करने, उनके लेन-देन का हिसाब रखने, उन्हें विभिन्न वित्तीय उत्पाद ऑनलाइन देने, उनके खाते अपडेट रखने और डिजिटल लेनदेन को सक्षम बनाने जैसे बैंकिंग कार्य आसान हुए हैं। इसका उद्देश्य डिजिटल ट्रांसफर के जरिए कम नकदी की जरूरत वाली व्यवस्था की ओर बढ़कर वित्तीय संस्थानों के कामकाज को सरल बनाना भी था। अंतरराष्ट्रीय मनी ट्रांसफर की सुविधा भी डिजिटल माध्यम से उपलब्ध कराई गई, ताकि ग्राहकों को बैंकों तक जाने की जरूरत न पड़े। इससे लगभग 9 हजार बैंक शाखाओं को बंद करने या मर्ज करने और इतनी ही शाखाओं को ग्रामीण क्षेत्र में बढ़ाने में मदद मिली। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि करंसी नोट छापने की जरूरत कम हो गई। ये सारे प्रयास वित्तीय संस्थानों के कामकाज में बदलाव लाने, उनमें लोगों की आवाजाही कम करने और आमने-सामने की मुलाकातें घटाने के लिए किए गए थे। इसके बाद मोबाइल बैंकिंग को बढ़ावा मिला, जिसने यूपीआई को सम्भव बनाया। वित्तीय संस्थानों ने अपनी कारोबारी प्रक्रियाओं को आसान बनाने के लिए टेक्नोलॉजी का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया। और हां, इस व्यवस्था की अपनी एक लागत भी है। फिर डाकघरों और सहकारी बैंकों का भी डिजिटलीकरण हुआ और सारे वित्तीय संस्थानों के भीतर और उनके बीच के लेनदेन के डिजिटल फुटप्रिंट तैयार होने लगे। फिनटेक की टेक्नोलॉजी की लागत, मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) और क्रेडिट कार्ड की पॉइंट ऑफ सेल (पीओएस) मशीनों ने वित्तीय संस्थानों को खुदरा लेन-देन में सक्षम बनाया। इससे डिजिटल भुगतान अंतिम छोर तक पहुंच गया। लेकिन अब बहस का मुद्दा यह है कि वित्तीय संस्थानों की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए डिजिटलीकरण पर जो खर्च हुआ- जिसका लाभ अंतत: उपभोक्ता तक ही पहुंचा है- उसकी लागत कौन वहन करे? इस लागत को खर्च के रूप में दर्ज किया जाता है और इसलिए इसकी पूरी भरपाई भी होनी है। लेकिन इस प्रक्रिया में उस भारी बचत को अनदेखा किया जा रहा है, जो करंसी नोट छापने की जरूरत घटने, खातों को अपडेट रखने में आसानी होने, क्लाइंटों से आमने-सामने मिलने की आवश्यकता घटने आदि सुविधाओं से हुई है। इन सबने पारदर्शिता बढ़ाई है और रीयल-टाइम अपडेट आसान हुआ है। इस सबसे रिजर्व बैंक समेत अन्य वित्तीय संस्थानों को भारी बचत हुई है। इसलिए इस व्यवस्था को बाधित करने के बजाय यह जरूरी है कि इस लागत को आरबीआई और बैंकिंग संस्थान स्वयं वहन करें। एमडीआर की लागत को व्यापारियों पर डालने के खिलाफ कड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। 83% दुकानदार इसका भुगतान करने से इनकार कर रहे हैं। आशंका यह भी है कि यदि यह लागत उपभोक्ताओं पर डाली गई, तो 86% उपभोक्ता यूपीआई के जरिए भुगतान से बचने लगेंगे। इससे खुदरा भुगतान के क्षेत्र में डिजिटलीकरण से मिली सफलता लड़खड़ा जाएगी। व्यापारियों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पहले से दिखाई देने लगा है। उन्होंने दो हजार रुपए से अधिक के भुगतान यूपीआई से लेना बंद कर दिया है और नकद मांगने लगे हैं। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहित करने के प्रयासों को नुकसान न पहुंचे। टेक्नोलॉजी की लागत उन संस्थानों को वहन करनी चाहिए, जिन्हें इससे लाभ मिलता है- यानी आरबीआई और बैंक। उपलब्ध विकल्पों पर ध्यान देना चाहिए। नोटबंदी के बाद से बाजार में नकदी 15 लाख करोड़ से बढ़कर 41 लाख करोड़ रुपए हो गई है, यानी लगभग तीन गुना। ऐसे में डिजिटल भुगतान में एमडीआर का वजन ऐसे कारोबारियों पर नहीं डालना चाहिए, जिनके कारोबार में इसकी गुंजाइश ही नहीं है। भले ही उपभोक्ताओं पर सीधे कोई शुल्क लगाने की वकालत नहीं की जा रही हो, लेकिन व्यापारियों के सामने दो ही विकल्प बचते हैं- या तो वे इसकी कीमत खुद वहन करें या फिर से नकदी लेन-देन शुरू कर दें। तीसरा विकल्प यह है कि वे इस लागत को उपभोक्ता पर डाल दें। लेकिन क्या ये वांछनीय विकल्प हैं? यूपीआई से रिजर्व बैंक समेत अन्य वित्तीय संस्थानों को भारी बचत हुई है। उन्हें कम करंसी नोट छापने पड़े हैं। ऐसे में इसे बाधित करने के बजाय यह जरूरी है कि इसकी लागत को आरबीआई और अन्य संस्थान स्वयं वहन करें।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)