पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:अन्न पर ही टिका होता है हमारा मानसिक स्वास्थ्य
इन दिनों बाजार में भोजन की जो दुर्गति हुई है, उसे नई पीढ़ी मानने को तैयार नहीं है। पहले कहा जाता था अज्ञात हाथों का भोजन न करें, क्योंकि हमारी संस्कृति ने अन्न को देव माना है और उसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ेगा। लेकिन पढ़े-लिखे लोग इसको नकार देते हैं कि क्या फर्क पड़ता है? पूरी दुनिया में आज 12 अरब लोगों के लिए भोजन का उत्पादन होता है और आबादी लगभग 8 अरब है। इस पर भी 86 करोड़ लोग भूखे सो रहे हैं। अब इस पर पढ़े-लिखे लोग क्या कहेंगे? भारत में 40% भोजन बर्बाद होता है। यह पढ़े-लिखे के तो लक्षण नहीं हैं। आप अन्न की शुद्धता आध्यात्मिक दृष्टि से स्वीकार नहीं करते हैं। हायजीनिक केयर ली जा रही है। ऑर्गेनिक सब्जियां, ऑर्गेनिक अन्न, इसका बड़ा हल्ला है। लेकिन बनाने वाले की मानसिकता पर विचार करना खत्म कर दिया गया है। जबकि मानसिक स्वास्थ्य उसी पर टिका है। इसलिए अन्न को केवल बाजार की वस्तु न मानकर मानसिक स्वास्थ्य की औषधि स्वीकार किया जाए।