पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:ईश्वर की अनुभूति भीतर हो तो उसमें कामना नहीं आ सकती
कामना का निर्माण भीतर से नहीं होता। भीतर से तो उसकी पूर्ति के प्रयास होते हैं। देखिए कामना बाहर से कैसे आती है। एक सुंदर चेहरा देखा और वह अंदर आया। किसी की बढ़िया गाड़ी देखी, वह अंदर आई, कामना बनी। फिर भीतर उसका निर्माण शुरू हुआ। हम जो बाहर से साधन भीतर भरते हैं, उससे कामना बनती है। तो भरना रोक दें, क्योंकि एक बार अगर अंदर निर्माण हुआ तो वह कहीं ना कहीं निकलेगा जरूर। कामना प्रकट होगी जरूर। दबाने पर और कई बीमारी आ जाएंगी। वस्तुएं-व्यक्ति जब भीतर आते हैं तो मन की चक्की उनको पीसती है और कामना का निर्माण हो जाता है। फिर कामना पूर्ति के लिए मनुष्य पता नहीं क्या-क्या करता है। तो कोशिश करें जब कोई चेहरा देखें, वस्तु देखें तो उसके प्रति एक समझ जगाएं कि यह बाहर का मामला है, बाहर ही रहे तो अच्छा। मैं भीतर क्यों लाऊं? लेकिन भीतर अगर कुछ खाली है तो भराव जल्दी हो जाएगा। तो भीतर का भराव भगवान से करें। अगर परमात्मा की अनुभूति, परमात्मा का नाम-जप भीतर भरा हुआ है तो बाहर से वह साधन भीतर आकर कामना निर्मित नहीं कर पाएंगे।