रीटा कोठारी का कॉलम:हमारे यहां ‘याद’ पर कितने गीत और कितने स्मारक हैं

Oct 24, 2026 - 08:00 - 08:00  70
रीटा कोठारी का कॉलम:हमारे यहां ‘याद’ पर कितने गीत और कितने स्मारक हैं
सुबह से मन में हलचल हो रही है। उठते ही जब बालकनी का दरवाजा खोला, ताकि पौधों के सान्निध्य में अखबार पढ़ा जाए तो एक फड़फड़ाते कबूतर को देखकर तुरंत दरवाजा बंद कर दिया। मेरी बालकनी में जाली लगी हुई है, ताकि कबूतर न आएं, पर एक कोने से जाली फट गयी थी। बहरहाल, मैं कमरे में बैठ गई और सोचा कबूतर अपना रास्ता ढूंढकर वापिस उसी फटी हुई जाली से निकल जाएगा। वही हुआ। किंतु कुछ देर बाद वह फिर से आया और फिर से फंस गया। मन में हलचल इस बात पर हुई कि क्या यह वही कबूतर था या दूसरा? अब यह तो मैं कभी जान न पाऊंगी और इसी सवाल से समझौता करना होगा कि हम इंसानों के बस में नहीं सब कुछ जानना। ​किंतु मुझे बार-बार यह भी सवाल उठ रहा था कि अगर वह कबूतर एक ही था तो क्या पक्षियों में स्मृति नहीं होती? फिर याद आया कि कबूतरों को तो रास्ते और जगहें याद रहती हैं तो स्मृति तो होगी ही। तो क्या स्मृतियों के प्रकार होते होंगे? क्या यह मुमकिन है कि कबूतर को रास्ता और मंजिल याद हों, पर वहां जो अनुभव हुआ वह याद नहीं रहा? यूं सोचते दिन बीत रहा था तो अचानक मेरी नजर एक किताब पर जाकर ठहर गई। किताबों की कतारों में एक छोटी-सी प्रति ‘सुखमनी साहिब’ की थी, जो कई साल पहले मां ने दी थी। सिंधी रतों का ‘सुखमनी साहिब’ से बड़ा गहरा रिश्ता है, जिसकी जड़ें मुझे ठीक से नहीं पता। सिमरन- ‘सुखमनी साहिब’ का एक अहम शब्द है- यह याद आ गया और मैंने सोचा यह भी ताजुब है कि मैं स्मृति के बारे में सोच रही थी और सिमरन दिख गया मुझे। ‘प्रभ कै सिमरनि गरभि न बसै / प्रभ कै सिमरनि दुखु जमु नसै।’ प्रभु के सिमरन से कितनी मुक्ति मिलती है- दु:खों से, जीने-मरने के चक्कर से। यह सिमरन या स्मृति इंसानों को पैदाइशी देन मिली है और शायद इंसान बनने की एक अहम क्रिया भी है। पर यह स्मृति या सिमरन समाधि के नजदीक है, न कि जिसको अंग्रेजी भाषा ‘मेमोरी’ के नाम से जानती है। शायद मेरा मतलब स्मरण-शक्ति से है, महज स्मरण से नहीं। हमारी भाषाओं में काफी सूक्ष्म फर्क हैं कुछ शब्दों में। समाधि की फितरत से याद करना या ध्यान करना, हृदय में टीस उठे ऐसे याद करना, जेहन में बिठाते हुए याददाश्त होना- परंतु अंग्रेजी में इतने सूक्ष्म फर्क नहीं दिखते। शायद इसलिए हम इतिहास और स्मृतियों के मसलों में नहीं पड़े, क्योंकि हमारे लिए एक खास तरह की स्मृति ही इतिहास है। हमारी संस्कृतियों को कई डंडे मारे गए हैं कि हममें इतिहास-बोध नहीं है! पर शायद इस सवाल की परिभाषा ही गलत है। गौर कीजिए कि हमारे यहां ‘याद’ पर कितने गीत, कितनी इमारतें और स्मारक बने हैं। अगर उन्हें हम सहेजकर नहीं रख पाते तो यह हमारे इतिहास-बोध या उसकी ओर लापरवाही नहीं है, उसका सबब कुछ और ही होगा। हमारी संस्थाओं की त्रुटियां हो सकती हैं, जमीन कम और अतिशय लोगों का भार हो सकता है। या फिर स्मृतियां हमारे जेहन में रहती हैं और उसके स्थूल स्वरूपों को हम अहमियत नहीं देते। शायद इसी वजह से जब लता मंगेशकर का देहांत हुआ था और हर जगह उनका गाया हुआ गीत- ‘नाम गुम जाएगा चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज ही पहचान है’ इतना उचित लग रहा था। हममें से कई लोग जानते थे कि यह 1977 की फिल्म ‘किनारा’ (निर्देशक, गुलजार) का गाना है, लेकिन बहुत-से लोगों ने इसे सिर्फ एक गाने की तरह ही सुना। गाने में धीमी आवाज में कही गई बात- ‘गर याद रहे’ पर ध्यान न देना आसान है। इसका मतलब है कि नाम बदलेंगे, चेहरे भी बदलेंगे, लेकिन ‘अगर’ आप याद रखना चाहें, तो मेरी आवाज बनी रहेगी। अतीत के मिट जाने और खो जाने की सम्भावना के बावजूद उसे जिंदा रखना एक सोच-समझकर किया गया फैसला है। फिल्म में जब भी किसी चीज के खोने का जिक्र आता है, तो उसे वापस पाने की इच्छा भी साथ होती है, क्योंकि समय में चोट पहुंचाने और घाव भरने, दोनों की ही खूबी होती है। फिल्म की शुरुआत में कोई कहता है कि हमें लगता है कि हम अभी भी मांडू के बाज बहादुर के जमाने में जी रहे हैं, और हमारे आज का जो हिस्सा बच जाता है, वही इतिहास बन जाता है। सच तो यह है दोस्तो कि हमें कबूतर तो क्या, अपने बारे में भी नहीं पता कि हमें याद रह जाता है या हम याद करने का फैसला करते हैं; या फिर स्मृति और इतिहास का कोई फर्क है भी या नहीं। हमारे पास कुछ शब्द हैं, जो अंग्रेजी से बने हैं और उनकी परिभाषाएं लेकर हम जिंदगी बिता देते है। अगर ठहर जाएं शब्दों की पगडंडियों पर, तो शायद अपनी प्रणालियों के बारे में भी सोचें। अतीत के मिट जाने की सम्भावना के बावजूद उसे जिंदा रखना एक सोच-समझकर किया गया फैसला है। जब खोने का जिक्र आता है, तो पाने की इच्छा भी साथ होती है, क्योंकि समय यदि चोट पहुंचाता है तो घाव भरना भी जानता है। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)