शिव्या नाथ का कॉलम:गांव-शहर के बीच की सीमाएं खूबसूरती से मिट जानी चाहिए
इक्वाडोर की एंडीज पर्वतमाला में रोमांच से भरा एक महीना बिताने के बाद मैं न्यूयॉर्क में वसंत का आनंद ले रही थी और भारत लौटने की तैयारी कर रही थी। मेरा मन हिमालय और वहां के गांवों के गर्मजोशी भरे लोगों के लिए बेचैन था। मुझे लगा कि अब आखिरकार काठगोदाम से सरमोली तक 11 घंटे की यात्रा करने का समय आ गया है। सरमोली पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी में स्थित एक सुंदर गांव है, जिसे भारत सरकार ने देश का सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांव चुना है। मुझे पर्वतारोहण की शौकीन मलिका विर्दी और सरमोली में होमस्टे शुरू करने के उनके काम के बारे में पता चला था। इसलिए मैंने उनसे पूछा कि क्या मैं कुछ समय उन पहाड़ों में ठहर सकती हूं। तब उन्होंने मुझे वहां हर साल गर्मियों में होने वाली एक परम्परा के बारे में बताया- एक हफ्ते चलने वाला हिमाल कलासूत्र उत्सव। इसमें सरमोली के लोग मिलकर 20 किलोमीटर की मैराथन दौड़ते हैं। इसमें करीब 8,000 फीट की ऊंचाई चढ़नी होती है (सुनकर ही दम फूल जाए!)। वे पहाड़ों पर जाकर पक्षियों को निहारते हैं। उस साल के उत्सव में एक सप्ताह तक ध्यान-योग कार्यक्रम तथा डिजिटल साक्षरता की कार्यशाला भी शामिल थी। अब तक मैंने कुमाऊं के छोटे-छोटे गांवों में काफी समय बिताया था और वहां के लोगों की समस्याओं को करीब से देखा था। जलावन की लकड़ियां इकट्ठा करना, स्कूल या निकटतम स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी पैदल तय करना, सामाजिक समस्याएं- इन सबके बीच मैराथन की तैयारी करने, स्थानीय पक्षियों की तलाश में निकलने या डिजिटल साक्षरता जैसी चीजों के लिए आखिर समय ही कहां बचता होगा? लेकिन सरमोली में बिताए दिनों ने भारत के ग्रामीण और शहरी जीवन के बीच विभाजन को लेकर मेरी धारणा ही बदल दी। पिछले कुछ वर्षों में मैंने यह मानना शुरू कर दिया था कि ग्रामीण भारतीय समुदायों की जीवन जीने की ज्यादातर पारंपरिक पद्धतियां नई पीढ़ी के साथ खत्म हो जाएंगी। और इसके लिए उन्हें दोष भी नहीं दिया जा सकता, क्योंकि हममें से हर कोई आधुनिक सुविधाएं और आसान जीवन चाहता है। लेकिन मलिका, थियो और राम का नजरिया सरल था : शहरी दुनिया की उपयोगी चीजों से स्थानीय लोगों को परिचित कराना और उन्हें ऑनलाइन दुनिया से जोड़ना। साथ ही, उन्हें पारंपरिक दुनिया की समझ को बचाए रखने के लिए प्रोत्साहित भी करना, जैसे प्राकृतिक जलस्रोतों को संरक्षित करना, अपनी भाषा पर गर्व करना और बाहर से आए लोगों के प्रति सत्कार की सहज भावना बनाए रखना। गांव के युवा काम के लिए बाहर जाना चाहें तो ठीक, लेकिन उन्हें मजबूरी या ऊब के कारण गांव छोड़ने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। मैं सरमोली के ‘माटी संगठन’ की बैठकों में भी बैठी। यह महिलाओं का स्वयं-सहायता समूह है। मैंने इस क्षेत्र की महिलाओं द्वारा झेली गई घरेलू हिंसा की दिल दहला देने वाली कहानियां सुनीं और कुछ मामलों को अपनी आंखों से भी देखा। यह भी देखा कि कैसे ‘माटी संगठन’ ने इन महिलाओं को सहारा देने और उन्हें सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। व्यक्तिगत व सामूहिक स्तर पर गंभीर मुद्दों से जूझते हुए भी वे महिलाएं एक साथ कई भूमिकाएं निभा रही थीं- होमस्टे संचालक, उद्यमी, गाइड, कार्यकर्ता और गृहणी की। फिर भी ऐसा कोई दिन नहीं जाता था जब हंसी-मजाक, एक-दूसरे की हल्की-फुल्की खिंचाई और जिंदगी के प्रति आभार जताने का मौका न आता हो। गर्मियों का उत्सव शुरू हुआ तो योग कार्यशाला में गांव के आधे से ज्यादा लोगों को ताड़ासन करते देख मैं हैरान रह गई! जब मुझे कार्यशाला के बारे में पता चला, तो मेरे मन में एक अजीब-सा खयाल आया- क्यों न इंस्टाग्राम के जरिए सरमोली के लोगों को अपनी कहानियां सीधे दुनिया के साथ साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए? लेकिन यह खयाल उतना अजीब नहीं निकला, जितना मुझे लगा था। इंस्टाग्राम का बुनियादी प्रशिक्षण लेने और फिर एक साथी यात्री से फोटोग्राफी के कुछ सुझाव सीखने के बाद वहां के लोग अब अपना इंस्टाग्राम चैनल खुद चलाने लगे हैं। इसमें वे अपनी जिंदगी, पहाड़ों, मौसमों और कहानियों को अपनी आवाज में दुनिया के सामने रखते हैं। मुझे लगा था कि धीरे-धीरे उनका उत्साह कम हो जाएगा, लेकिन इस अकाउंट की पहुंच और लोगों की भागीदारी न केवल बढ़ी है, बल्कि उनकी कहानी कहने और फोटोग्राफी की क्षमता भी निखरी है- वह भी सीमित सुविधाओं, साधारण फोन और अंग्रेजी भाषा की सीमित जानकारी के बावजूद। गांव और शहर के बीच की सीमाएं ऐसे ही खूबसूरती से मिट जानी चाहिए! इस गांव के लोग अब अपना इंस्टाग्राम चैनल खुद चलाने लगे हैं। इसमें वे अपनी जिंदगी, पहाड़ों, मौसमों और कहानियों को दुनिया के सामने रखते हैं। समय के साथ उनकी कहानी कहने और फोटोग्राफी की क्षमता और निखरी ही है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)