सुखवीर सिंह का कॉलम:दुनिया की कहानी अब केवल अमेरिकी ताकत से नहीं लिखी जाएगी

Oct 1, 2026 - 03:13 - 15:13  761
सुखवीर सिंह का कॉलम:दुनिया की कहानी अब केवल अमेरिकी ताकत से नहीं लिखी जाएगी
वॉशिंगटन के जॉइंट बेस एंड्रयू पर उस दिन एक असाधारण दृश्य था। शी जिनपिंग के विमान से उतरते ही ट्रम्प स्वयं उनका स्वागत करने पहुंचे। अगले दिन व्हाइट हाउस में राजकीय भोज, सैन्य सम्मान और गर्मजोशी भरी कूटनीतिक भाषा ने इस दृश्य को और अर्थपूर्ण बना दिया। लेकिन इसके पीछे एक गम्भीर सवाल था- क्या अमेरिका चीन को मना रहा है? और यदि अमेरिका को डॉलर की स्थिति को संभालने के लिए चीन के सहयोग की जरूरत है, तो क्या बीजिंग आसानी से रहम करेगा? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रीय कर्ज सितंबर 2026 में 40.10 ट्रिलियन डॉलर पार कर चुका है। पिछले एक वर्ष में इसमें 2.67 ट्रिलियन डॉलर की वृद्धि हुई। आईएमएफ भी चेतावनी दे चुका है कि अमेरिकी सार्वजनिक कर्ज और अल्पकालिक कर्ज पर बढ़ती निर्भरता वैश्विक वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम बढ़ा रही है। फिर भी डॉलर की वैश्विक स्थिति अभी इतनी मजबूत है कि आईएमएफ के अनुसार 2026 की पहली तिमाही में विश्व के आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडारों में डॉलर की हिस्सेदारी 57.13% थी। अमेरिका की असाधारण शक्ति का बड़ा आधार यह है कि उसकी मुद्रा केवल उसकी ही नहीं है। दुनिया के केंद्रीय बैंक डॉलर रखते हैं, अंतरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर में होता है और संकट के समय अमेरिकी ट्रेजरी को सुरक्षित परिसंपत्ति माना जाता है। अप्रैल 2025 में वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में प्रतिदिन लगभग 9.6 ट्रिलियन डॉलर का कारोबार हुआ और 89.2% लेन-देन में डॉलर एक पक्ष था। यही वह व्यवस्था है, जिसने अमेरिका को दशकों तक अपनी आय से अधिक खर्च करने की सुविधा दी। अमेरिका सामान आयात करता है, व्यापार घाटा चलाता है और बदले में दुनिया अमेरिकी वित्तीय परिसंपत्तियां खरीदती है। अमेरिका दुनिया से सामान लेता है और दुनिया उसके कागजी दावे सहेजती है। चीन अमेरिका का सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी होने के साथ-साथ उसकी आर्थिक संरचना का महत्वपूर्ण भागीदार भी है। इसलिए चीन यदि अमेरिकी वित्तीय परिसंपत्तियों में अपनी भूमिका अचानक बदलता है, तो उसका प्रभाव केवल अमेरिका नहीं, वैश्विक वित्तीय बाजारों पर भी पड़ सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि चीन अमेरिका के हित में काम करेगा। वह अपने हित में धीरे-धीरे विकल्प बना रहा है। आईएमएफ के अनुसार 2026 की पहली तिमाही में वैश्विक आधिकारिक भंडारों में चीनी रेनमिन्बी की हिस्सेदारी केवल 1.99% थी- डॉलर के 57.13% से बहुत दूर। फिर भी बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटलमेंट्स के अनुसार 2025 में रेनमिन्बी वैश्विक विदेशी मुद्रा कारोबार में 8.5% हिस्सेदारी तक पहुंच चुका था। अमेरिका चाहता है कि चीन अधिक अमेरिकी वस्तुएं खरीदे, व्यापार घाटा घटे और डॉलर मजबूत रहे। दूसरी ओर वह चीन की तकनीकी क्षमता को सीमित करना चाहता है। वह चीन से रेयर अर्थ एलिमेंट्स की आपूर्ति चाहता है, लेकिन अपनी उन्नत तकनीक चीन तक पहुंचने से रोकता है। चीन से सहयोग भी चाहिए और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी करनी है। एक हाथ में टैरिफ, दूसरे हाथ में लाल कालीन- अमेरिकी नीति का यही विरोधाभास है। जिस अमेरिका ने दुनिया को डॉलर पर निर्भर बनाया, आज उसे यह सुनिश्चित करने के लिए चीन से बातचीत करनी पड़ रही है कि वैश्विक व्यवस्था अचानक उसके विरुद्ध न मुड़ जाए। ट्रम्प द्वारा शी का हवाई अड्डे पर स्वागत केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं है; यह उस बदलती विश्व अर्थव्यवस्था का प्रतीक भी है, जिसमें अमेरिका अभी सबसे शक्तिशाली खिलाड़ी है, लेकिन अब अकेला खिलाड़ी नहीं। डॉलर अभी संकट में नहीं है। पर उसकी कहानी अब केवल अमेरिकी ताकत से नहीं लिखी जाएगी। (ये लेखक के अपने विचार हैं)