अमिताभ कांत का कॉलम:अकेले सेवा क्षेत्र के ही कंधों पर नौकरियों का बोझ क्यों?
वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें लगातार 8 से 9% की ऐसी आर्थिक वृद्धि चाहिए, जो मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात के मजबूत आधार पर टिकी हो। देश के कुल उत्पादन में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की हिस्सेदारी अब भी लगभग 15 से 17% ही है, जबकि हमें हर साल 80 लाख से एक करोड़ गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजित करने हैं। अकेला सर्विस सेक्टर इतने ज्यादा रोजगार पैदा नहीं कर सकता और न ही भारत मजबूत निर्यात के बिना महज आयात पर निर्भर रह सकता है। इसलिए मैन्युफैक्चरिंग को आर्थिक वृद्धि, रोजगार और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता का इंजन बनाना ही होगा। वैश्विक वैल्यू चेन नए सिरे से गढ़ी जा रही हैं तो ऐसे में भारत के पास भी मौका है कि वह पूंजी लागत, बिजली, औद्योगिक भूमि की लीज और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में सुधार करे। चीन में वाणिज्यिक ऋण पर औसत ब्याज दर 3 से 4.5% के बीच है, जबकि वियतनाम में 5.5 से 6.14% है। इसके मुकाबले भारत में एमएसएमई को 8.99 से 20% तक की ब्याज दर पर कर्ज मिलता है। इससे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने में उन्हें बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता है। पर्याप्त जमानत, विस्तृत वित्तीय रिकॉर्ड या आय के स्थिर स्रोतों के अभाव में इन उद्यमों को अकसर पारंपरिक बैंकिंग व्यवस्था में लोन नहीं मिल पाता। इसके समाधान के लिए पहला कदम बैंकों द्वारा औपचारिक क्रेडिट-फ्लो का विस्तार होना चाहिए। अब चुनौती इस बात की है कि अधिक से अधिक उद्यमों तक ऋण पहुंचे। पंजीकृत एमएसएमई में से केवल 41% ही कभी औपचारिक ऋण ले पाते हैं। वहीं, नए ऋण लेने वाले उद्यमों की हिस्सेदारी 2022-23 के 52% की तुलना में 2025-26 में 42% रह गई। बैंकों को कैश-फ्लो के आधार पर ऋण देने की व्यवस्था को बढ़ाना चाहिए। दूसरा, भारत को बैंकिंग सुधारों के जरिए ऋण की लागत के मसले को सुलझाना होगा। केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित विकसित भारत के लिए उच्चस्तरीय बैंकिंग समिति का गठन जल्द करके उसका इस्तेमाल बैंकिंग क्षेत्र में व्यापक सुधारों का एजेंडा तैयार करने के लिए करना भी जरूरी होगा। बिजली के मामले में भारत ने उत्पादन तो कर लिया, अब जरूरत इस बात की है कि यह बिजली नियमित तौर पर और प्रतिस्पर्धी दरों पर कारखानों तक पहुंचे। बिजली वितरण की अक्षमताएं उद्योगों पर एक छिपे हुए कर का बोझ डाल रही हैं। यदि भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनना है तो बिजली को उसकी प्रतिस्पर्धात्मकता का साधन बनाना होगा। औद्योगिक भूमि लीज के मामले में अभी राष्ट्रीय स्तर पर विन्डो सिस्टम मौजूद है। इससे आवेदनों की ट्रैकिंग में तो मदद मिलती है, लेकिन आवेदन लंबित हो या आवेदक को फास्ट-ट्रैक सर्विस चाहिए तो इस सिस्टम के पास निर्णय करने का अधिकार नहीं है। कोई एमएसएमई जब शुरुआत करता है तो उसे यह निर्णय करना होता है कि वह जमीन खरीदे या अपने कारोबार में पैसा निवेश करे। मौजूदा व्यवस्था अब लीज एंड बिल्ड से रेंट एंड ऑपरेट मॉडल की ओर बढ़ रही है। अंत में लॉजिस्टिक्स। विश्व बैंक के 2023 के लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इन्डेक्स (एलपीआई) में भारत 139 अर्थव्यवस्थाओं में 38वें स्थान पर था। जबकि चीन 19वें पर था। भारतीय बंदरगाह जहाजों के तेज आवागमन को लेकर चुनौतियां झेल रहे हैं। आयात की अधिकता वाले बंदरगाहों पर यार्ड और भंडारण की बढ़ती अनिश्चितता इस व्यवस्था पर संदेह और बढ़ा देती है। इससे निपटने के लिए भारत को अपनी सीमा शुल्क व्यवस्था को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त का साधन बनाना होगा। भविष्य में हमारा फोकस टिकाऊ सुधारों को लागू करने और जवाबदेह फ्रैमवर्क तय करने पर होना चाहिए। देश के कुल उत्पादन में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की हिस्सेदारी अब भी 15 से 17% ही है, जबकि हमें हर साल 80 लाख से एक करोड़ गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजित करने हैं। अकेला सर्विस सेक्टर इतने रोजगार पैदा नहीं कर सकता।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)