आरती जेरथ का कॉलम:नेताओं को सार्वजनिक मंचों पर शालीनता का परिचय देना होगा

Oct 27, 2026 - 02:00 - 14:00  30
आरती जेरथ का कॉलम:नेताओं को सार्वजनिक मंचों पर  शालीनता का परिचय देना होगा
उत्तराखंड के मंत्री सुबोध उनियाल हाल ही में उस समय चर्चाओं में आए, जब उन्होंने नई टिहरी में सरकार द्वारा प्रायोजित एक पर्यटन मेले में प्रस्तुति दे रहे मशहूर पंजाबी गायक दलेर मेहंदी को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया। कार्यक्रम के बीच में ही उनियाल मंच पर चढ़ गए और मेहंदी पर आरोप लगाया कि वे नशे में हैं, ठीक से खड़े नहीं हो पा रहे हैं या बोल नहीं पा रहे हैं और लाइव गाने के बजाय रिकॉर्ड किए हुए गाने पर केवल होंठ हिला रहे हैं। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि मेहंदी इस कार्यक्रम के लिए उन्हें दी गई 35 लाख रुपये की राशि का सम्मान नहीं कर रहे हैं। घटना का वीडियो वायरल होने के बाद बॉलीवुड की कई प्रमुख हस्तियों ने इस व्यवहार की आलोचना की। इनमें अनुपम खेर के साथ दलेर मेहंदी के भाई व गायक मीका सिंह भी शामिल हैं। उन्होंने कहा एक प्रतिष्ठित व लोकप्रिय कलाकार के साथ इस तरह का दुर्व्यवहार अनुचित है, वह भी उन दर्शकों के सामने जो उनका गायन सुनने के लिए वहां इकट्ठा हुए थे। हर कहानी के दो पहलू होते हैं। हो सकता है कि उस रात दलेर मेहंदी का गायन अपेक्षित स्तर का न रहा हो। यह भी सच है कि अगर उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था तो उन्हें इस कार्यक्रम का निमंत्रण स्वीकार नहीं करना चाहिए था। लेकिन लोगों को दलेर मेहंदी के सार्वजनिक अपमान ने ज्यादा हैरान किया है। उन पर न केवल नशे में होने के अपुष्ट आरोप लगाए गए, बल्कि कार्यक्रम के लिए उन्हें दी गई पारिश्रमिक राशि का सार्वजनिक रूप से उल्लेख करने में भी शालीनता नहीं थी। अगर दलेर मेहंदी की प्रस्तुति स्तरीय नहीं थी और दर्शक इसको लेकर खुश नहीं थे, तो इस स्थिति को कहीं बेहतर ढंग से संभाला जा सकता था। मसलन, कार्यक्रम के मध्यांतर में मेहंदी को मंच के पीछे ले जाकर विनम्रता से उनसे पूछा जा सकता था कि क्या वे ठीक हैं? संभवतः यह पहली बार है, जब किसी नेता ने किसी प्रतिष्ठित कलाकार के साथ ऐसा व्यवहार किया हो। आमतौर पर ऐसे व्यवहार का निशाना नौकरशाह बनते हैं, खासकर स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी, जिनका अपने निर्वाचन क्षेत्रों की विकास परियोजनाओं को लेकर राजनेताओं से टकराव होता रहता है। अधिकारियों को लेकर मिल रही शिकायतों के कुछ वाजिब कारण भी हो सकते हैं। लेकिन नेताओं के अभद्र आचरण की खबरें चिंताजनक रूप से लगातार सामने आ रही हैं। कभी-कभी ऐसे टकराव केवल तीखी बहस और ऊंची आवाज में कहासुनी तक सीमित रहते हैं। लेकिन अब तो अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल, निलंबन और अन्य दंडात्मक कार्रवाइयों की धमकियां भी बढ़ती दिखाई दे रही हैं। उदाहरण के लिए कांग्रेस के पूर्व विधायक नीतेश राणे और उनके समर्थकों ने एक बार महाराष्ट्र में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के एक डिप्टी इंजीनियर को पुल की रेलिंग से बांध दिया था और उन पर कीचड़ उड़ेला गया था। इसकी वजह मुंबई-गोवा राजमार्ग का खराब रखरखाव और सड़क पर मौजूद गड्ढे थे। भाजपा सांसद कंगना रनौत भी मंडी में स्थानीय अधिकारियों को अपमानित करती रही हैं। हाल ही में ऐसे ही एक विवाद के दौरान उन्होंने अधिकारियों को ‘आलसी’ और ‘नाकाबिल’ कहा था। मध्य प्रदेश में भाजपा विधायक प्रीतम लोधी ने शिवपुरी में एक बैठक के दौरान अधिकारियों को धमकाया था कि सहयोग नहीं करने वाले अधिकारियों के घरों के पानी और बिजली के कनेक्शन काट दिए जाएंगे। कहीं किसी स्थानीय अधिकारी को क्रिकेट के बल्ले से पीटा गया, तो कहीं महिला अधिकारियों और यहां तक कि एक महिला पुलिस कांस्टेबल को भी थप्पड़ मारे गए। कलेक्टर जैसे अधिकारियों के साथ भी तीखी नोकझोंक की कई घटनाएं सामने आई हैं। यह प्रवृत्ति ऐसे समय में विशेष रूप से दिखाई दे रही है, जब राजनीति में प्रतिस्पर्धा बेहद आक्रामक होती जा रही है। पहले राजनीतिक दल उम्मीदवारों के जनसेवा के रिकॉर्ड को महत्व देते थे, लेकिन अब वे उम्मीदवार चुनते समय उनकी जीतने की क्षमता को अधिक प्राथमिकता देने लगे हैं। नतीजतन, जिस उम्मीदवार के पास धनबल और बाहुबल होता है, उसके लिए चुनाव लड़ने का टिकट हासिल करना आसान हो जाता है। लेकिन लेगेसी आईएएस रिपोर्ट के एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि मौजूदा सांसदों और विधायकों में से लगभग 30 प्रतिशत के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। यह जानकारी चुनाव के समय उम्मीदवारों द्वारा दिए गए स्वयं उनके शपथ-पत्रों पर आधारित है। ऐसे में क्या यह कोई आश्चर्य की बात है कि हमारे अनेक निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के व्यवहार में आजकल शालीनता का अभाव दिखाई देता है? अब उम्मीदवार चुनते समय उनकी जीतने की क्षमता को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। धनबल और बाहुबल वालों के लिए टिकट हासिल करना आसान हो जाता है। यही कारण है कि मौजूदा सांसदों और विधायकों में से लगभग 30 प्रतिशत के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)