एन. रघुरामन का कॉलम:कुछ दृश्य हमारी यादों में अमिट होते हैं, वे फिल्माए नहीं जाते
जीवन में कुछ दृश्य ऐसे होते हैं, जिन्हें फिल्माने की जरूरत नहीं होती। वे बस वहां मौजूद होते हैं और उन्हें हम देख भर लेते हैं। फिर भी वे सालों तक, कभी-कभी तो जीवनभर हमारे साथ बने रहते हैं। वह भी ऐसा ही एक दृश्य था। मैं उसे कभी नहीं भूलूंगा। 1995 का साल था। मैं काम से घर लौटा ही था कि मैंने अपनी लगभग चार साल की बेटी को अकेले बोर्ड गेम खेलते देखा। वह बोर्ड के एक छोर से दूसरे छोर तक कूदती, कभी अपनी तरफ से खेलती तो कभी अपनी काल्पनिक पार्टनर की तरफ से। वह ऐसा दृश्य था जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता। मेरी आंखें भर आईं। कुछ समय पहले तक दिन भर उसके साथ खेलने के लिए एक पार्टनर हुआ करती थीं। लेकिन पिछले दो महीनों से वे उसके साथ नहीं थीं। वे उसकी दादी थीं। अब बच्ची अकेली रह गई थी। मैंने तुरंत साबुन से हाथ धोए, फर्श पर बैठा और उसके साथ खेलने लगा। उसका पूरा ध्यान बोर्ड पर था। हर बार पांसा फेंकने पर वह उत्साह से चीख उठती। मैं भी उसके साथ चीखता, लेकिन मेरी कमीज धीरे-धीरे आंसुओं से भीगती जा रही थी। मेरी पत्नी ने अचानक रसोई का काम समेटा और दो बॉउल लिए हमारे पास आकर बैठ गई। खाना वही था- दही-चावल- लेकिन दोनों के लिए अलग तरह से बनाया गया था। बेटी के बॉउल का दही-चावल अच्छी तरह से मसल दिया गया था, वहीं मेरे बॉउल में कुछ और चीजें भी मिली हुई थीं। हम दोनों को बार-बार पांसा फेंकना था, इसलिए हाथों से खाना संभव नहीं था। तब मेरी पत्नी ने तय किया कि वह अपनी बच्ची और एक ऐसे 35 साल के बच्चे- जिसने हाल ही में अपनी मां को खोया था- दोनों को अपने हाथों से खिलाएगी। हर बार जब बेटी को कौर खिलाया जाता, हम ताली बजाते। हर बार जब पत्नी मुझे खिलाती, हमारी आंखें मिलतीं। उसकी आंखें जैसे कह रही थीं, मैं तुम्हारी पीड़ा समझती हूं। प्लीज शांत हो जाओ। लेकिन जिसे खिलाया जा रहा था, उसकी आंखों में अकथनीय पीड़ा थी। मुझे नहीं मालूम, कौन-सी पीड़ा ज्यादा थी। क्या वह मां को खोने की पीड़ा थी? या उस मासूम बच्ची को अकेले खेलते देखने की, जो यह नहीं जानती थी कि उसकी प्रिय पार्टनर अब कभी वापस नहीं आएंगी? या फिर उस पिता का डर ज्यादा बड़ा था, जो सोच रहा था कि अगर बेटी ने अचानक पूछ लिया मेरी पार्टनर कब वापस आएगी- तो वह क्या जवाब देगा? मेरे पास कोई जवाब नहीं था। शायद हममें से किसी के पास नहीं था। उस शाम बोर्ड गेम, पांसे, दही-चावल, एक-दूसरे को खिलाना और आंखों की वे खामोश मुलाकातें उस क्षति से निपटने का हमारा तरीका बन गईं, जिसे हममें से कोई भी शब्दों में समझा नहीं सकता था। उस प्यार, स्पर्श, एक-दूसरे को खिलाने और आंखों के मिलने का नतीजा बहुत सरल था। आंसू। सिर्फ आंसू। शुक्रवार की रात मुझे यह सब याद हो आया, जब मैं एक ऐसे कार्यक्रम में था, जिसमें तीन अलग-अलग दुनिया की तीन दिग्गज हस्तियां मौजूद थीं- अमिताभ बच्चन, गुलजार और सचिन तेंदुलकर। एक भारतीय सिनेमा की आवाज और चेहरा हैं, दूसरे उसके कवि-दार्शनिक और तीसरे क्रिकेट के सबसे चहेते सितारे। लेकिन वह कार्यक्रम न फिल्मों के बारे में था, न कविता के बारे में और न क्रिकेट के बारे में। वह भावनाओं से भरा हुआ था और मैंने वहां के कई दृश्य अपने भीतर दर्ज किए। इन्हीं में से एक दृश्य उन दादा- डॉ. पी. जगन्नाथ से जुड़ा था, जो मशहूर सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट हैं। उनकी किताब के विमोचन कार्यक्रम में ही ये हस्तियां पहुंची थीं। मंच पर तीन-तीन दिग्गजों के होने के बावजूद वे अपने दस साल से भी छोटे पोते-पोतियों- इवान और वियाना को अगर ज्यादा नहीं तो कम से कम उतनी ही अहमियत दे रहे थे। इन बच्चों ने ही ऑडियंस के सामने अपने दादा को इंट्रोड्यूस किया कि उन्होंने कैसे ‘ब्लू’ नाम दिया। मेरे जैसा कोई आम आदमी इन दिग्गजों की मौजूदगी में होने पर गर्व से फूला न समाता, लेकिन उन डॉक्टर के लिए ऐसा नहीं था। उन्होंने अपनी हर सफलता से पहले अपने परिवार, खासकर अपने पोते-पोतियों को रखा था। फंडा यह है कि जरूरी नहीं कि जिंदगी में सबसे ज्यादा मायने रखने वाले लोग सबसे बड़े मंच पर खड़े हों। वे आपके पास बैठे वे छोटे भी हो सकते हैं, जो आपका ध्यान पाने का इंतजार कर रहे हों। आप जिंदगी में कितनी भी ऊंचाई तक पहुंच जाएं, सफलता की असली कसौटी यही है कि क्या आप अब भी झुककर किसी बच्चे का हाथ थाम सकते हैं।