एन. रघुरामन का कॉलम:सच्चे प्यार के लिए ‘ना’ कहने की हिम्मत क्यों जरूरी है?
पिछले हफ्ते कन्याकुमारी की सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मधुमिता अपने बिजनेसमैन पति के साथ परिवार के लिए शॉपिंग करने गई थीं। लौटकर देखा तो बेडरूम की अलमारी का ताला टूटा था और करीब एक करोड़ रुपए का कीमती सामान गायब था। पुलिस हैरान थी कि चोरों को शाम का वह छोटा-सा समय कैसे पता चला, जब घर पर कोई मौजूद नहीं था। जांच में जब पुलिस ने मधुमिता की सोशल मीडिया एक्टिविटी देखी तो पुलिसकर्मियों को हैरानी हुई कि रील्स और पोस्ट में वे घर पर अपनी ज्वेलरी और गद्दे पर फैले नोटों के बंडल दिखा रही थीं। बच्चे पर नोटों की बारिश कर रही थीं। जांच अधिकारी ने बताया कि ‘उन्होंने ऐसे वीडियो भी अपलोड किए, जिनमें वे परिवार के हर महीने सोना खरीदने की डींगें मार रही थीं। दूसरी रील्स में नियमित तौर पर वे यह खुलासा करती थीं कि परिवार कहां और किस काम से बाहर जा रहा है।’ इस घटना को यह कहकर खारिज मत कीजिए कि ‘इस फिजूल बात को पढ़कर समय क्यों बर्बाद करें?’ मैं सुन सकता हूं कि आप इसकी बुराई करते हुए ‘टट-टटिंग’ की आवाज निकाल रहे हैं। पहली बात, मधुमिता की यह हरकत हमें सीखने का एक बड़ा मौका देती है। देखिए, कम से कम आपको यह तो पता चल गया कि ये ‘टट-टटिंग’ की आवाज कहां सुनाई दे सकती है। इसका मतलब है जीभ को मुंह की ऊपरी सतह से लगाकर ऐसी आवाज निकालना, जिससे असहमति, झुंझलाहट या हल्की निराशा जाहिर हो। दूसरी बात, मधुमिता की बच्चे पर नोट बरसाने और सोशल मीडिया अटेंशन के लिए इसे फिल्माने की बेवकूफी ने मुझे फ्रेंच नॉवेलिस्ट ऑनरे द बाल्जाक की यह पुरानी कहावत याद दिला दी कि ‘हर बड़ी दौलत के पीछे कोई न कोई बड़ा अपराध छिपा होता है।’ यह पंक्ति उनके 1835 के फ्रेंच नॉवेल ‘ले पेयर गोरियो’ से है, जिसका अर्थ है ‘फादर गोरियो’। कहानी 1819 के पेरिस में रहने वाले एक बुजुर्ग पिता की है, जो अपनी दो अहसान-फरामोश बेटियों के लिए सब कुछ कुर्बान कर देते हैं। गोरियो अपनी पूरी दौलत उनके ऐशो-आराम और हाई-सोसायटी में उनकी शादियां कराने पर खर्च करते हैं। जब उनका पैसा खत्म हो जाता है तो बेटियां उन्हें छोड़ जाती हैं और वह अत्यंत गरीबी में मर जाते हैं। इस ट्रेजेडी को देखकर रस्तिन्याक नाम का एक यंग स्टूडेंट सीखता है कि लालच और सामाजिक महत्वाकांक्षा के लिए ईमानदारी छोड़ देना किसी व्यक्ति के चरित्र को नष्ट कर देता है। जब मैंने यह किताब पढ़ी तो इससे मुझे दो बातें सीखने को मिलीं। बच्चों के लिए यह किताब बताती है कि कैसे सच्ची खुशी प्यार, कृतज्ञता और ईमानदारी से मिलती है, दौलत या सामाजिक हैसियत से नहीं। यह इस बात पर जोर देती है कि सच्चा प्यार पैसे से नहीं खरीदा जा सकता और यह हमें लालच से सावधान भी करती है। सबसे अहम, यह बच्चों को याद दिलाती है कि भौतिक सुविधाओं पर ध्यान देने के बजाय उन्हें पैरेंट्स के नि:स्वार्थ त्याग का सम्मान और कद्र करनी चाहिए। बड़ों को यह भलीभांति बताती है कि भले ही आप खुद भौतिकवाद को न अपनाएं, लेकिन इस बात को अनदेखा नहीं कर सकते कि आपकी संपत्ति या ऊर्जा का दूसरों पर क्या असर पड़ रहा है। आंख मूंद कर बेटियों की दिखावे-भरी लाइफस्टाइल के लिए पैसा देकर गोरियो ने अनजाने में उसी हाई-सोसायटी करप्शन को बढ़ावा दिया, जिसने उनके परिवार को बर्बाद कर दिया। पैसे को लेकर पूरी तरह से बेपरवाही बरतना आपके आसपास के लोगों के लालच को बढ़ावा दे सकता है। लेकिन दौलत से भरे इस समय में लागू होने वाला सबसे बड़ा सबक यह है कि गोरियो का खुद को पूरी तरह कुर्बान कर देना भी उसकी बेटियों को नहीं बचा पाया। उलटे, इससे उनका दिखावा बढ़ा, स्वार्थ बढ़ा और आखिरकार उनका चरित्र ही बिगड़ गया। यानी, नि:स्वार्थ समर्पण की भी सीमा न हो तो वह विनाशकारी हो सकता है। यह उपन्यास हमें याद दिलाता है कि स्टेटस से संचालित होने वाली इस दुनिया में कदम रखते समय हमें अपनी आत्मा का बचाव करना चाहिए। यह हमें नैतिकता और मानवीय संवेदना बरकरार रखने की चुनौती देता है, उन हालात में भी जब आप ऐसी दुनिया में घिरे हों, जो इंसान की कीमत सिर्फ उसके बैंक खाते से तय करती है। फंडा यह है कि प्यार के नाम पर सब कुछ कुर्बान करना भी यह गारंटी नहीं देता कि नतीजा अच्छा ही होगा। सच्चे प्यार के लिए ‘ना’ कहने की हिम्मत भी चाहिए, ताकि अपने प्रियजनों को बुरी मनोवृत्तियों से बचाया जा सके।