डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम:आज कुछ लोग ‘ओवरट्रीटमेंट’ तो कई लोग ‘अंडरट्रीटमेंट’ के शिकार हैं
हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि एक तरफ ऐसे लोग हैं, जिन्हें जरूरत से ज्यादा जांच, दवाइयां, सप्लीमेंट और उपचार मिल रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ करोड़ों ऐसे हैं, जिन्हें बुनियादी चिकित्सा, आवश्यक जांच और जरूरी दवाइयां भी समय पर मिल नहीं पातीं। एक व्यक्ति बड़े शहर के निजी अस्पताल में हल्की थकान लेकर पहुंचता है। दर्जनों जांचें होती हैं। रिपोर्ट में विटामिन डी थोड़ा कम, यूरिक एसिड अधिक, कोलेस्ट्रॉल सीमा से ऊपर और कुछ संख्याएं लाल रंग में आती हैं। कुछ ही दिनों में उसके पास नई दवाइयां, सप्लीमेंट्स और अगली जांचों की सूची होती है। दूसरी ओर, किसी कस्बे या गांव में एक व्यक्ति वर्षों से बढ़े रक्तचाप के साथ घूम रहा होता है। नियमित जांच नहीं हुई, दवा नहीं मिली, मधुमेह देर से पकड़ा गया और डॉक्टर तक पहुंच मुश्किल रही। वह अस्पताल तब पहुंचा, जब स्ट्रोक हो चुका था या किडनी प्रभावित हो चुकी थी। ये दोनों दृश्य भारत के ही हैं। इसीलिए कहा जा सकता है कि भारत की आधी स्वास्थ्य समस्या ‘ओवरट्रीटमेंट’ और आधी स्वास्थ्य समस्या ‘अंडरट्रीटमेंट’ की है। शहरों में चिकित्सा का एक हिस्सा इस धारणा पर चलने लगा है कि ज्यादा जांच मतलब बेहतर इलाज, ज्यादा स्कैन मतलब अधिक सावधानी और ज्यादा दवाइयां मतलब अच्छा उपचार। लेकिन चिकित्सा विज्ञान ऐसा नहीं कहता। हर असामान्य संख्या बीमारी नहीं होती, हर बीमारी को तुरंत दवा की जरूरत नहीं होती और हर दवा स्वास्थ्य नहीं देती। केवल यूरिक एसिड बढ़ा होना बीमारी नहीं है। केवल विटामिन डी की कम रिपोर्ट अपने-आप बीमारी नहीं बन जाती। केवल कोलेस्ट्रॉल की एक संख्या देखकर किसी व्यक्ति का पूरा हृदय जोखिम तय नहीं किया जा सकता। उम्र, रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान, पारिवारिक इतिहास, वजन, शारीरिक गतिविधि को भी देखना चाहिए। लेकिन हमारी चिकित्सा धीरे-धीरे मरीज-केंद्रित से रिपोर्ट-केंद्रित होती जा रही है। मरीज कहता है कि वह ठीक महसूस कर रहा है, लेकिन रिपोर्ट की एक संख्या सामान्य सीमा से बाहर है और कई बार वही संख्या पूरे उपचार का केंद्र बन जाती है। यहीं से अनावश्यक निदान और इलाज की शुरुआत होती है। एक जांच दूसरी को जन्म देती है। फिर दवा शुरू होती है। कई बार वह दवा वर्षों तक चलती रहती है। लेकिन अनावश्यक चिकित्सा भी नुकसान कर सकती है। दवाइयों के दुष्प्रभाव हो सकते हैं, जांचों में झूठे परिणाम आ सकते हैं, अनावश्यक स्कैन चिंता बढ़ा सकते हैं और खर्च अलग से जुड़ता है। अधिक चिकित्सा हमेशा बेहतर चिकित्सा नहीं होती। दूसरी तरफ देश के कई हिस्सों में स्थिति बिल्कुल उलटी है। आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता असमान है। लोगों का रक्तचाप वर्षों तक जांचा नहीं जाता। मधुमेह की पहचान देर से होती है। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और पुरानी बीमारियों वाले मरीजों को नियमित फॉलो-अप नहीं मिल पाता। मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं सीमित हैं। आवश्यक दवाइयों की निरंतर उपलब्धता भी चुनौती बनी हुई है। जहां एक तरफ बिना जरूरत महंगी जांचें हो रही हैं तो दूसरी तरफ जरूरी जांचें तक नहीं हो रही हैं। एक तरफ किसी को तीसरी एमआरआई मिल रही है, दूसरी तरफ किसी का ब्लड प्रेशर भी ठीक से नहीं मापा गया है। एक तरफ व्यक्ति पांच सप्लीमेंट खा रहा है, दूसरी तरफ किसी मरीज को उसकी जरूरी एक दवा भी नियमित नहीं मिल रही। हमें ‘फास्ट मेडिसिन’ के साथ ‘स्लो मेडिसिन’ की समझ भी विकसित करनी होगी। फास्ट मेडिसिन तब जरूरी है, जब हार्ट अटैक हो, स्ट्रोक हो, गंभीर संक्रमण हो, दुर्घटना हो या तत्काल हस्तक्षेप चाहिए। लेकिन हर समस्या आपातस्थिति नहीं होती। हल्का बढ़ा यूरिक एसिड, बॉर्डर-लाइन कोलेस्ट्रॉल, सामान्य उम्र-संबंधी परिवर्तन या बिना लक्षण की छोटी असामान्यताएं डॉक्टर और मरीज को सोचने का समय देती हैं। वहां पहले जीवनशैली, भोजन, नींद, वजन, व्यायाम और निगरानी का विकल्प होना चाहिए। कभी-कभी अच्छी चिकित्सा का अर्थ होता है कुछ न करना, लेकिन सावधानी से देखते रहना। (ये लेखक के अपने विचार हैं)