पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:भगवान से वह भक्ति मांगें, जो तपस्वियों को भी उपलब्ध न हो
काकभुशुंडि जी के सामने श्रीराम जी खड़े थे और कहा, मांग ले। काकभुशुंडि जी ने श्रीराम जी से वो भक्ति मांगी, जो बड़े-बड़े साधु-संतों को भी उपलब्ध नहीं होती। तब राम जी को कहना पड़ा- रीझेउँ देखी तोरी चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई। वही भक्ति तूने मांगी, तेरी चतुरता देखकर मैं रीझ गया। हम संसार के सामने चतुराई दिखाते हैं, लेकिन जब हमें भगवान के सामने चतुराई दिखाने का मौका मिले तो उनसे वह भक्ति मांगनी चाहिए, जो बड़े-बड़े तपस्वियों को उपलब्ध न हो। तो भगवान समझ जाते हैं कि मेरा भक्त समझदार है और सचमुच मुझसे भक्ति ही मांगने आया है। विज्ञान कहता है हमारे मस्तिष्क का एक बड़ा हिस्सा है- सेरिब्रम, जिसमें बुद्धि और चतुराई दोनों होते हैं। बुद्धि का कैसे उपयोग करें, यह संकेत चतुराई करती है। इसलिए कम से कम 24 घंटे में दो बार आंख बंद करके कल्पना करिए कि ईश्वर हमारे सामने खड़े हैं और हम उनसे कुछ ऐसा मांगें कि वे हमारी चतुराई की प्रशंसा करें।