बरखा दत्त का कॉलम:नागरिकता साबित करने का बोझ किस पर होना चाहिए?

Oct 14, 2026 - 08:00 - 08:00  321
बरखा दत्त का कॉलम:नागरिकता साबित करने का बोझ किस पर होना चाहिए?
इस बात से अंतत: फर्क नहीं पड़ता कि आप भाजपा समर्थक हैं या कांग्रेस समर्थक। लेकिन मतदाता सूचियों में संशोधन की जो प्रक्रिया एसआईआर के रूप में चली है, उसके परिणाम सबके सामने हैं। एक भारतीय के रूप में हम अकसर अपने पड़ोसी देशों की राजनीतिक अस्थिरता को देखा करते थे। पाकिस्तान में सेना के नेतृत्व वाली सरकारें, बांग्लादेश में हिंसक अशांति, नेपाल और श्रीलंका में उथल-पुथल तथा म्यांमार में सैन्य तख्तापलट। ये दृश्य देखकर हमें अपने मजबूत लोकतंत्र पर स्वाभाविक गर्व होता था और राहत भी मिलती थी। हमारे यहां एक चुनाव से दूसरे चुनाव तक सत्ता का हस्तांतरण हमेशा शांतिपूर्ण ढंग से होता रहा है। लेकिन हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार चुनावी जनादेश पर बहस हो रही है, उसे चुनौती दी जा रही है, उस पर सवाल उठाए जा रहे हैं। माना कि ज्ञानेश कुमार पहले ऐसे सीईसी नहीं हैं, जिन पर राजनीतिक पक्षधरता का आरोप लगा हो। कांग्रेस के शासनकाल में भी नवीन चावला पर ऐसे आरोप लगे थे। एम.एस.गिल तो चुनाव आयोग में भूमिका निभाने के बाद यूपीए सरकार में मंत्री भी बन गए थे। इन अर्थों में चुनाव आयोग के राजनीतिकरण का केवल हालिया इतिहास नहीं है। लेकिन इन दिनों जो हो रहा है, वह बिल्कुल अलग स्तर का है। हाल के वर्षों में चुनाव आयोग के आचरण को लेकर होने वाली बहसें मुख्यतः इस बात पर केंद्रित रही हैं कि क्या आदर्श आचार संहिता का पालन हुआ, या आयोग का कोई अधिकारी किसी खास नेता की हेट-स्पीच या हेलिकॉप्टर की लैंडिंग को लेकर जरूरत से ज्यादा नरम या सख्त रहा। लेकिन यह पहली बार है, जब चुनावों को लेकर उठे विवाद ने संविधान-प्रदत्त मताधिकार को प्रभावित किया है। चुनाव आयोग का काम और वास्तव में उसका कर्तव्य तो यही है कि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को चुनाव में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करे। इस पूरी कवायद की मूल भावना समावेशी ही होनी चाहिए। लेकिन एसआईआर की अपनी व्याख्या के तहत चुनाव आयोग ने इस भावना को उलट दिया और नागरिकों पर अपनी नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी डाल दी। अगर एसआईआर का मकसद भारत में अवैध रूप से रह रहे लोगों को मतदाता सूची से बाहर करना है, तो निश्चित रूप से इसका सबूत जुटाने की जिम्मेदारी राज्यसत्ता और उसकी सुरक्षा एजेंसियों की होनी चाहिए। फिर अचानक नागरिकों से नागरिकता साबित करने को क्यों कहा गया- वह भी इतनी जटिल प्रक्रिया के जरिए? और हमेशा की तरह, इसकी मार गरीबों, बेघर लोगों और समाज के हाशिये पर जी रहे लोगों पर ज्यादा पड़ी है। शहरों से बाहर यात्रा करने वाला कोई भी व्यक्ति जानता है कि अगर आप किसी बुजुर्ग से उसकी उम्र पूछें, तो अकसर उन्हें भी ठीक-ठीक पता नहीं होता। उनके पास जन्म प्रमाणपत्र जैसा कोई दस्तावेज सहेजकर रखा हुआ नहीं होता। ऐसे में एसआईआर को लेकर मौजूदा बहस के केंद्र में यही सवाल है कि नागरिकता साबित करने का बोझ किस पर होना चाहिए। एसआईआर प्रक्रिया के समर्थकों ने विपक्ष के इस दावे को चुनौती देने के लिए चुनाव आयोग के आंकड़ों का हवाला दिया है कि देशभर में 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। भाजपा ने हाल ही में बताया कि इनमें से 2.8 करोड़ नाम मृत लोगों के थे, जबकि 6.3 करोड़ लोग दूसरी जगह चले गए थे; एक करोड़ नाम दोहराव वाली प्रविष्टियां थीं और तीन करोड़ लोगों का पता नहीं चल पाया। इसके बावजूद, हर कोई किसी-न-किसी ऐसे व्यक्ति को जानता है, जिसे मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने के लिए संघर्ष करना पड़ा है। दिल्ली में तो निकट भविष्य में कोई चुनाव भी नहीं होना है, फिर भी मतदाताओं की संख्या 1.45 करोड़ से घटकर ड्राफ्ट लिस्ट में 97.53 लाख रह गई है। 33 लाख मतदाताओं को उन कारणों से नोटिस मिले, जिन्हें निर्वाचन आयोग ने ‘तार्किक विसंगति’ कहा। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल उठाया कि क्या ये नोटिस मशीनों से तैयार किए गए थे? बंगाल में तो नाम या उम्र में मेल न होने के चलते मतदाता सूचियों से 27.16 लाख नाम हटा दिए गए। निर्वाचन आयोग की इस कवायद के खिलाफ 22 लाख अपीलें दायर किए जाने की खबर है। अब तक केवल 1 लाख अपीलों का निपटारा हुआ है, जिनमें से 93 प्रतिशत मामलों में संबंधित लोगों को वैध मतदाता पाया गया। आखिर ऐसी किसी व्यवस्था को कुशल कैसे माना जा सकता है, जो नागरिकों को अपने मतदान के अधिकार के लिए कानूनी पचड़ों से गुजरने पर मजबूर करती है? मतदान एक संवैधानिक अधिकार है, कोई विशेष सुविधा नहीं। चुनाव आयोग का काम और वास्तव में उसका कर्तव्य तो यही है कि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को चुनाव में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करे। इस पूरी कवायद की मूल भावना समावेशी ही होनी चाहिए। इस पर सवाल उठना शुभ संकेत नहीं है। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)