रुचिर शर्मा का कॉलम:मस्क, आल्टमैन व जकरबर्ग पर फिल्में हमें क्या बताती हैं?
मैं कई वर्षों से फोर्ब्स की अरबपतियों की सूची का विश्लेषण कर रहा हूं, ताकि उन देशों की पहचान कर सकूं, जहां सम्पत्ति की बढ़ती असमानता सामाजिक उथल-पुथल का कारण बन सकती है। इसके पीछे एक प्रमुख धारणा यह है कि जहां सम्पत्ति का प्रवाह टेक्नोलॉजी जैसे इनोवेटिव और उत्पादकता बढ़ाने वाले क्षेत्रों के ‘गुड बिलियनेअर्स’ की ओर होता है, वहां इस खतरे की आशंका कम होती है। इसके विपरीत, रियल एस्टेट और खनन जैसे उद्योगों में ‘बैड बिलियनेअर्स’ के उभरने पर यह खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि इन क्षेत्रों की रेगुलेटरी तंत्र पर हावी होने की प्रवृत्ति होती है।
लेकिन हॉलीवुड अब इस कहानी की पटकथा बदल रहा है। 2000 में डॉटकॉम बबल फूटने के बाद धीरे-धीरे आई फिल्में या तो उत्सवधर्मी थीं या फिर लालच में पड़ गए ‘नर्ड्स’ (तकनीक-प्रेमी लोगों) की आंशिक रूप से हास्यपूर्ण त्रासदियां। लेकिन अब ऐसी फिल्मों की बाढ़ आ रही है, जो यूनानी त्रासदियों के अधिक करीब हैं और सिलिकॉन वैली के अरबपतियों को उनकी महत्त्वाकांक्षाओं और उदासीनता के लिए कठघरे में खड़ा करती हैं। इन फिल्मों के निशाने पर सैम ऑल्टमैन (‘आर्टिफिशियल’), मार्क जकरबर्ग (‘द सोशल रेकनिंग’) और इलॉन मस्क (‘मस्क’) हैं। ऐसी और फिल्में भी आने वाली हैं। इन नई फिल्मों को देखकर मैं सोचने लगा कि ऐसा क्यों हो रहा है और इसका परिणाम क्या होगा। किसी आर्थिक संकट के बाद कॉर्पोरेट्स को निशाना बनाना हॉलीवुड की पुरानी प्रवृत्ति रही है- जैसा कि 2008 के वित्तीय संकट के बाद हुआ था। लेकिन एआई की तेजी अभी भी पूरी रफ्तार से जारी है। अमेरिकियों ने इन टेक-बिलियनेअर्स में अपना पैसा लगाया हुआ है और वे उनके उत्पादों तथा सेवाओं को तेजी से अपना रहे हैं- फिर भी उनमें उनके प्रति निराशा लगातार बढ़ रही है। यह नाराजगी निजी स्तर पर है। डॉटकॉम के दौर में अमेरिकी जनता ने डिजिटल क्रांति को खुले दिल से अपनाया था, लेकिन हाल के वर्षों में उसने टेक-जगत के सबसे बड़े सितारों से मुंह मोड़ लिया है। मस्क और जकरबर्ग की लोकप्रियता रेटिंग्स अब निगेटिव में पहुंच चुकी हैं। आमतौर पर अमेरिकी जनता से अधिक वामपंथी रुझान रखने वाला हॉलीवुड अब बिग टेक के सीईओ को ‘बैड बिलियनेअर्स’ के रूप में पेश करने के मामले में मुख्यधारा के रुख के करीब दिखाई देता है। इससे संकेत मिलता है कि समय के साथ जनता की प्रतिक्रिया और तीखी हो सकती है। इन फिल्मों में एक प्रमुख विषय यह है कि सिलिकॉन वैली अहंकार और दर्प से ग्रस्त हो चुकी है। ‘आर्टिफिशियल’ के निर्देशक लुका ग्वाडानिनो ने सैम ऑल्टमैन को इस पर विचार करते दिखाया है कि एआई ने ‘पैंडोरा का जो पिटारा’ खोल दिया है, वह देशों और उद्योगों को धराशायी कर देगा, जबकि इसके उलट हम लोगों को नई दुनिया में ले जाने का दावा कर रहे हैं। वहीं, ‘मस्क’ के निर्देशक एलेक्स गिबनी अपनी फिल्म के नायक की सबसे बड़ी कमजोरी यह बताते हैं कि उसे अपने उद्देश्य की श्रेष्ठता पर अंधा विश्वास है। उसे लगता है कि उस उद्देश्य को हासिल करने के लिए उसे कुछ भी कर गुजरने की अनुमति मिलनी चाहिए। अब इन अरबपतियों को अवसरवादी और एकाधिकारवादी के रूप में देखा जाने लगा है, जिनकी सत्ता प्रतिष्ठान से सांठगांठ है। यह छवि उन्हें पर्दे पर खलनायक बनाने के लिए मुफीद है। ‘मस्क’ का दूसरा आधा हिस्सा इस बात पर केंद्रित है कि टेस्ला और स्पेसएक्स के प्रमुख ने ट्रम्प के लिए तथाकथित ‘डीप स्टेट’ को ध्वस्त करने की कोशिश कैसे बेतरतीब ढंग से की। वहीं ‘द सोशल रेकनिंग’ के निर्देशक आरोन सोर्किन ने जकरबर्ग को डींगें हांकते दिखाया है कि फेसबुक दुनिया के सबसे बड़े देश से भी दोगुना बड़ा है और इसलिए वह सरकारों से परे है तथा अमेरिकी सरकार से नहीं डरता। सोर्किन ने इससे पहले 2010 में आई फिल्म ‘द सोशल नेटवर्क’ की भी पटकथा लिखी थी, लेकिन उनकी नई फिल्म में जकरबर्ग का किरदार पहले से अधिक निष्ठुर और संवेदनहीन है। ये फिल्में अमेरिका में व्याप्त सत्ता-विरोधी मनोस्थिति को दिखाती हैं। एआई की उत्पादकता और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने की क्षमता को देखते हुए मेरे विचार से अभी इस लहर में बहने की जल्दबाजी करना ठीक नहीं होगा। लेकिन अमीरों के प्रति लोगों की धारणाओं में बदलाव सामाजिक अशांति का संकेत हो सकता है। आज के माहौल में तकनीकी क्षेत्र के दिग्गजों को ‘अच्छे’ अरबपतियों की सूची में बनाए रखना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। टेक-जगत के इन अरबपतियों को अब अवसरवादी व एकाधिकारवादी के रूप में देखा जाने लगा है, जिनकी सत्ता प्रतिष्ठान से सांठगांठ है। यह छवि उन्हें परदे पर खलनायक बनाने के लिए मुफीद है। लोगों में उनके प्रति नाराजगी दिखती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)