संजय कुमार का कॉलम:केंद्र और राज्यों में सामंजस्य होना चाहिए, टकराव नहीं

Oct 17, 2026 - 02:00 - 14:00  240
संजय कुमार का कॉलम:केंद्र और राज्यों में सामंजस्य होना चाहिए, टकराव नहीं
माइन्स एंड मिनरल्स एक्ट 2026 का कुछ राज्यों ने विरोध किया है। उन्हें आशंका है कि यह खनन गतिविधियों से होने वाली उनकी टैक्स आय पर असर डालेगा। संशोधित एक्ट में खनन पर केंद्र के नियामक दायरे का विस्तार हुआ है। अब इसमें माइन एंड मिनरल डेवलपमेंट के साथ ही खनिजयुक्त भूमि को भी शामिल किया गया है। एक्ट केंद्र की ओर से निर्धारित शर्तों से इतर राज्यों को खनिज अधिकारों और खनिजयुक्त भूमि पर नए टैक्स लगाने से भी रोकता है। लागू होने तक यह कानून राज्यों की ओर से लगाए ऐसे मिनरल टैक्सों को भी रद्द करता है, जिनकी वसूली पूरी नहीं हो सकी है। झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों के गैर-कर राजस्व में खनिजों से होने वाली प्राप्तियों की हिस्सेदारी करीब 80% है। ऐसे में इन राज्यों की खनिज संबंधी टैक्स लगाने और वसूल करने की क्षमता को प्रतिबंधित करने के गहरे निहितार्थ हो सकते हैं। तेलंगाना में यह हिस्सेदारी 11% और छत्तीसगढ़ में 6% है। इससे पता चलता है कि वे राजस्व के लिहाज से खनिजों पर अधिक निर्भर नहीं हैं। इसलिए इन राज्यों पर नए प्रावधानों का तत्काल वित्तीय प्रभाव भी सीमित हो सकता है। कर्नाटक, एमपी और राजस्थान भी खनिज राजस्व पर काफी निर्भर हैं। गैर-कर राजस्व में खनिज प्राप्तियों की हिस्सेदारी कर्नाटक में 48%, एमपी में 41% और राजस्थान में 39% है। लेकिन संशोधित अधिनियम पर इन तमाम राज्यों की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग रही हैं। इससे पता चलता है कि राजस्व-निर्भरता ही कानून के विरोध का इकलौता कारण नहीं है। इस संदर्भ में ओडिशा की प्रतिक्रिया विशेष रूप से उल्लेखनीय है। खनिजों से अपने गैर-कर राजस्व का बड़ा हिस्सा प्राप्त करने के बावजूद राज्य में इस कानून को लेकर सरकार और विपक्ष की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं है। विपक्षी बीजद ने कानून की कड़ी आलोचना करते हुए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है। वहीं भाजपा सरकार ने यह मांग खारिज करते हुए तर्क दिया है कि संशोधन से ओडिशा के खनिज राजस्व को नुकसान नहीं होगा। तेलंगाना में खनिज प्राप्तियां राज्य के गैर-कर राजस्व की 11% ही हैं, फिर भी वहां की सरकार अन्य गैर-भाजपा शासित राज्यों के साथ नए कानून को चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट जा रही है। इस कानून को लेकर सियासी प्रतिक्रिया का यह अंतर अन्य राज्यों में भी दिखता है। कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश और केरलम कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। इनका तर्क है कि खनिज अधिकारों व खनिजयुक्त भूमि पर टैक्स लगाने की राज्य सरकार की क्षमता को कम करना उनकी वित्तीय शक्तियों व संघीय व्यवस्था के सिद्धांतों को कमजोर करता है। केरलम ने तो यह भी कहा कि खनिजयुक्त भूमि को इस तरह ट्रीट करना राज्य के तटीय-वन क्षेत्र में भी केंद्र के अधिकारों को बढ़ाता है। झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने चेतावनी दी है कि खनिज करों से मिलने वाले राजस्व में अगर कमी आई तो इसका असर लाखों लोगों को लाभान्वित करने वाली सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर पड़ सकता है, क्योंकि संशोधित एक्ट पिछले कुछ बकाया करों की वसूली को भी अमान्य करता है। लेकिन मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की सरकारों ने एक्ट को लेकर अभी ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। असंतोष का यह सियासी भूगोल भारतीय संघवाद की एक दिलचस्प खासियत को दिखाता है। भले ही यहां प्रमुख चिंता राज्यों की वित्तीय शक्तियों में कमी आने की हो, फिर भी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समीकरणों पर ही यह निर्भर करता है कि कोई मसला किस हद तक संघीय मुद्दा बनेगा। खनिजों पर निर्भरता का मामला आर्थिक हितों से जुड़ा है, पर सियासी तालमेल भी इस पर असर डालते हैं कि ये हित केंद्र के खिलाफ संगठित चुनौती में बदलेंगे या नहीं। भारत जैसे संघीय व्यवस्था वाले देश में केंद्र और राज्यों के बीच विभिन्न मुद्दों पर मतभेद होना कोई असामान्य बात नहीं है। भले ही संविधान ने दोनों के बीच अधिकारों का बंटवारा कर रखा हो, लेकिन जब केंद्र और राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें होती हैं तो ऐसे मतभेद उभरने की आशंका और बढ़ जाती है। विधायी क्षेत्राधिकार, वित्तीय संसाधनों, प्रशासनिक नियंत्रण और यहां तक कि विदेश नीति से जुड़े मसलों में भी केंद्र-राज्यों के बीच टकराव समय-समय पर सामने आते रहे हैं। जीएसटी मुआवजे, वित्त आयोगों के टर्म ऑफ रेफरेंस, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, नागरिकता संशोधन अधिनियम और अखिल भारतीय सेवा नियमों में प्रस्तावित संशोधनों जैसे मामले इसके उदाहरण हैं। खनिज कानून में संशोधन इसमें एक और बिंदु जोड़ता है। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समीकरणों पर ही यह निर्भर करता है कि कोई मसला किस हद तक संघीय मुद्दा बनेगा। खनिजों पर निर्भरता का मामला आर्थिक हितों से जुड़ा तो है, पर सियासी तालमेल भी इस पर असर डालते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)