एन. रघुरामन का कॉलम:अगर आपके ‘थर्ड स्पेस’ में अकेलापन है तो यह खतरनाक है
दुनियाभर में स्क्रीन-फोकस्ड आबादी को यह एहसास हो गया है कि आधुनिक समाज में सबसे मुश्किल से मिलने वाली चीज ‘दोस्त’ हैं। चूंकि अकेलापन अब कई लोगों के लिए शर्म से भरा एक सीक्रेट बन गया है, इसलिए अब वे हजारों अनजान लोगों के सामने अपना अकेलापन स्वीकार रहे हैं- इस उम्मीद में कि शायद इनमें से कोई उनके साथ दोस्त की तरह वक्त बिताना चाहे। एक क्लासिफाइड विज्ञापन में लिखा है कि ‘मैं अकेलेपन से थक चुका हूं। यह सुनने में दुखद लग सकता है, लेकिन मुझे सच में कुछ दोस्त बनाने हैं।’ अमेरिका में सैकड़ों लोग ऐसे विज्ञापन पोस्ट करके अपनी भावनाएं खुलकर जाहिर कर रहे हैं और प्रयासरत हैं कि उन्हें कुछ गैर-रोमांटिक कनेक्शन मिल जाएं। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर फ्रेंडशिप रिसर्च की डायरेक्टर जैमी क्रेम्स कहती हैं कि ‘इस तरह की गुहार लगाना किसी की दोस्ती वाली ‘टैक्सी लाइट’ की तरह है, जो अकेलेपन को लेकर उनकी ईमानदारी को बताती है।’ ‘टैक्सी लाइट’ शब्द एविएशन इंडस्ट्री का एक यूनिवर्सल टर्म है, जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है, जब रनवे पर लगी कलर-कोडेड नीली लाइटों की मदद से विमान को उतारा जाता है। यह स्पष्ट करता है कि बहुत से लोग अपनी जिंदगी की भी सुरक्षित लैंडिंग चाहते हैं। क्रेम्स कहती हैं कि ‘अगर दोस्ती कोई दवा है, तो शायद यह सबसे ज्यादा लिखी जाने वाली दवा होगी।’ एडल्ट फ्रेंडशिप पर विशेषज्ञता रखने वाली क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट मिरियम किर्मायर कहती हैं कि ‘ऑनलाइन नए दोस्त बनाने के लिए टेक्नीक चाहिए। बेहतर होगा कि आप अपनी जरूरत साफ बताएं। जैसे, मैं हर शुक्रवार जिम जाने के लिए दोस्त तलाश रहा हूं।’ हैरानी नहीं कि टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ‘फ्रेंडशिप एप्लिकेशन’ उपलब्ध हैं। 33 साल की टॉट्श तब बहुत उलझन में पड़ गईं, जब उनकी सबसे अच्छी दोस्त को बच्चा हो गया और वह अपने पैरेंट्स के घर चली गई। वह ऐसे दोस्त बनाना चाहती थीं, जिनके बच्चे न हों। उन्हें पहला रिप्लाई मिला, ‘यह अजीब है।’ टॉट्श ने जवाब दिया कि ‘हां, यह अजीब है। और इसीलिए मैं यह वीडियो बना रही हूं, ताकि अपने जैसे दूसरे अजीब लोग ढूंढ सकूं।’ उनकी पोस्ट को जल्द ही हजारों लाइक्स मिले। कमेंट्स में जवाब देने वालों में से आज उनकी दो बेस्ट फ्रेंड्स हैं। तब से वे उनके साथ घूमने गई हैं। वे साथ में कॉन्सर्ट और शो देखने जाती हैं और अपनी शामें अच्छे-से बिताती हैं। मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में टॉट्श कहती हैं कि ‘मुझे पता था कि मुझे जानने वाले लोग मुझे मूर्ख समझ सकते हैं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि अपनी चाहत बताने में कोई शर्म की बात है।’ यह उन लोगों के लिए चेतावनी है, जो एक-दो दशक पहले की तुलना में अब कम सोशलाइज होते हैं और उनके करीबी दोस्त भी कम हैं। सोशल साइकोलॉजिस्ट इसकी वजहों में घर और ऑफिस से इतर ‘थर्ड स्पेस’ के घटने, स्क्रीन के हमारे समय पर हावी होने और वयस्क जीवन में शादी, पैरेंटहुड और अपना घर होने जैसी जिम्मेदारियों के देर से आने या शायद ही आने जैसी चीजें गिनाते हैं। ‘थर्ड स्पेस’ उस सामाजिक माहौल को कहते हैं, जो उन दो प्राथमिक जगहों से अलग होता है, जहां लोग अपना ज्यादातर समय बिताते हैं- पहली जगह घर और दूसरी ऑफिस या स्कूल। अर्बन सोशियोलॉजिस्ट रे ओल्डेनबर्ग द्वारा ईजाद यह शब्द ‘थर्ड स्पेस’ कम्युनिटी लाइफ का आधार है और व्यापक व रचनात्मक सामाजिक मेलजोल को बढ़ावा देता है। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के सर्वे सेंटर ऑफ अमेरिकन लाइफ के मुताबिक, मोबाइल-ऑब्सेस्ड आबादी में ज्यादा से ज्यादा लोग यह महसूस करने लगे हैं कि संतोषपूर्ण जीवन के लिए दोस्त उतने ही जरूरी हैं, जितनी शादी या बच्चे। लेकिन ऑनलाइन बने बहुत-से रिश्ते शायद ही स्थायी दोस्ती में बदल पाते हैं। जेसिका लेच जैसी महिलाएं भी हैं, जिनकी पोस्ट पर 800 लोगों ने दिलचस्पी दिखाई, लेकिन सिर्फ एक ही उनकी सच्ची दोस्त बन सकी। फंडा यह है कि हमें गहराई से सोचना चाहिए कि क्या हमें अपना जीवन आज की स्क्रीन-फोकस्ड एकाकी आबादी की तरह जीना चाहिए, जो अब दोस्तों के लिए विज्ञापन दे रही है। या फिर, हमें बचपन से ही ऐसे दोस्त बनाने चाहिए, जो हमारी जिंदगी को सार्थक बना सकें। दूसरा विकल्प हमारे ‘थर्ड स्पेस’ को उद्देश्यपूर्ण बनाए रखेगा।