एन. रघुरामन का कॉलम:क्या ‘हार्डशिप कैम्प’ में बच्चे मेहनत का महत्व सीखते हैं?
हममें से अधिकांश ने अपने आसपास ऐसे कई बच्चे देखे होंगे, जिन्होंने कभी खाना बनाने में हाथ नहीं बंटाया। कुछ बच्चों को इतने लाड़-प्यार से पाला जाता है कि उन्होंने कभी अपना कमरा तक साफ नहीं किया होता है। इसकी वजह यह है कि बहुत-से माता-पिता यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं कि उनके बच्चों को उन मुश्किलों का सामना न करना पड़े, जिनसे वे खुद गुजरे हैं। वे अपने बच्चों को अच्छा भोजन, आरामदेह घर, महंगे गैजेट्स, ट्रांसपोर्ट और हरसम्भव सुख-सुविधाएं मुहैया कराते हैं। लेकिन इस सब के चलते ऐसा भी हो सकता है कि बच्चे इन सुविधाओं को किसी की मेहनत का परिणाम मानने के बजाय अपना अधिकार समझने लगें। अब मैं आपको एक ऐसे शिविर में लिए चलता हूं, जो ऊपर वर्णित दृश्य से बिल्कुल उलट है। यहां आपको दस साल का एक बच्चा पोटेटो-फार्म में खुदाई करके आलू निकालता दिखाई देगा। सात साल का एक बच्चा पिग-फार्म में चारा ले जा रहा होगा। पंद्रह साल का किशोर घोड़े को नहलाकर अस्तबल की सफाई कर रहा होगा। यहां छह से सोलह साल तक के बच्चों को जानवरों का गोबर साफ करते, जलाऊ लकड़ियां काटते और यहां तक कि साधारण भोजन पकाते भी देखा जा सकता है। पूरे महीने इतनी मेहनत करने के बावजूद इन बच्चों को इसके बदले कोई भुगतान नहीं किया जाता। उलटे, उनके माता-पिता उन्हें ऐसे ‘हार्डशिप कैम्प’ में भेजने के लिए डेढ़ लाख रुपये तक चुकाते हैं। ये शिविर मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिमी चीन के ग्रामीण इलाकों में चलाए जाते हैं। अपने बच्चों को मेहनत और पैसों का महत्व सिखाने की इच्छा रखने वाले चीनी पैरेंट्स में इस तरह के शिविरों के प्रति दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है। अब सवाल यह है कि क्या पैरेंट्स अपने बच्चों को मुश्किलों से बचाने में इतने सफल हो गए हैं कि अब उन्हें वे तमाम सबक सिखाने के लिए दूसरों को पैसे देने पड़ रहे हैं, जो कभी साधारण जीवन अपने आप और मुफ्त में सिखा देता था? इसका जवाब है- हां। यही वजह है कि माता-पिता अपने लाड़ले बच्चों को इन तेजी से लोकप्रिय हो रहे समर प्रोग्राम्स में भेज रहे हैं। सिचुआन, गुइझोउ और युन्नान जैसे इलाकों में आयोजित होने वाले इन शिविरों में शहरों के बच्चों को ग्रामीण जीवन का अनुभव कराया जाता है। इस दौरान उन्हें मोबाइल फोन और इंटरनेट से दूर रखा जाता है। इस सबका मकसद बच्चों के बचपन को मुश्किलों से भर देना नहीं, बल्कि उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाना है। कड़ी मेहनत बच्चों को असफलताओं से जूझना भी सिखाती है। जब उन्हें कोई काम पूरा करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, तो वे धैर्य सीखते हैं। गलतियां करने पर वे उन्हें सुधारना सीखते हैं। वे अपनी मेहनत से हासिल की गई चीजों की कद्र भी ज्यादा कर पाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे समझने लगते हैं कि असुविधाओं से सामना होने का मतलब हमेशा हार मान लेना नहीं होता। कभी-कभी वे आगे बढ़ने का अवसर भी होती हैं। इन शिविरों के संचालकों का कहना है कि उनका उद्देश्य शहरों के सुविधाजनक जीवन के आदी हो चुके बच्चों को यह एहसास कराना है कि खुद मेहनत करके पैसा कमाना कितना कठिन होता है। वे स्मार्टफोन के अत्यधिक इस्तेमाल की आदत छुड़ाने, खाने-पीने में नखरे और आलस्य की प्रवृत्ति दूर करने और पैरेंट्स की मेहनत के प्रति बच्चों में कृतज्ञता की भावना पैदा करने को भी अपना लक्ष्य बताते हैं। चूंकि इन कार्यक्रमों में बच्चे शामिल होते हैं, इसलिए अधिकांश संचालक यह सुनिश्चित करते हैं कि उनसे उनकी क्षमता से अधिक शारीरिक मेहनत न कराई जाए। साथ ही, काम और आराम के बीच उनके लिए मनोरंजक गतिविधियों की व्यवस्था भी की जाती है। क्या इन शिविरों से बच्चों की आदतें सचमुच बदलती हैं? इस सवाल पर विशेषज्ञों और अभिभावकों की राय बंटी हुई है। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि थोड़े समय के लिए कराए गए कठिन शारीरिक श्रम को बच्चों की जीवनशैली और आदतों में सुधार से सीधे तौर पर नहीं जोड़ा जाना चाहिए। किसी बच्चे को कठिन परिस्थितियों में रखने पर यदि वह कुछ समय के लिए आत्मचिंतन करता हुआ दिखाई भी दे, तो यह तनाव के प्रति उसकी तात्कालिक प्रतिक्रिया हो सकती है। केवल ‘मुश्किलें सहने’ का अनुभव अपने आप में चरित्र निर्माण की गारंटी नहीं है। फिर भी, कुछ अभिभावकों का कहना है कि शहरों में पले-बढ़े बच्चों को ऐसे शिविरों में श्रम का प्रत्यक्ष अनुभव कराना न केवल शैक्षिक दृष्टि से उपयोगी साबित हुआ है, बल्कि शिविर से लौटने के बाद उनके व्यवहार में भी सकारात्मक बदलाव दिखाई दिए हैं। वे पहले से अधिक संवेदनशील और दयालु हो गए हैं। यदि आप भारत में ऐसे विंटर कैम्प्स के बारे में जानना चाहते हैं, तो मुझे लिखें। फंडा यह है कि अपने बच्चों का जीवन आरामदेह बनाने के लिए ही मेहनत न करें। इस बात के लिए भी मेहनत करें कि वे खुद मेहनत करने के काबिल बन सकें। आरामदेह बचपन एक विशेषाधिकार है, लेकिन कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता जीवन भर काम आने वाली पूंजी है।