डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम:स्वस्थ भारत लेबल से ही नहीं, बेहतर खाद्य व्यवस्था से बनेगा

Oct 1, 2026 - 03:13 - 15:13  761
डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम:स्वस्थ भारत लेबल से ही नहीं, बेहतर खाद्य व्यवस्था से बनेगा
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भारत में पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के सामने चेतावनी लेबल लगाने की दिशा में प्रगति हुई है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने प्रस्ताव दिया है कि जिन खाद्य पदार्थों में चीनी, नमक या संतृप्त वसा अधिक हो, उनके पैकेट के सामने लाल षट्कोण में ‘हाई शुगर’, ‘हाई साल्ट’ या ‘हाई फैट’ जैसी चेतावनी लिखी जाए। उपभोक्ता को यह जानने का अधिकार है कि वह जो खरीद रहा है, उसमें स्वास्थ्य के लिए चिंता पैदा करने वाले तत्व कितनी मात्रा में हैं। अभी किसी बिस्किट, नमकीन, खाद्य या पेय की पैकिंग के सामने बड़े अक्षरों में ‘हाई प्रोटीन’, ‘मल्टीग्रेन’, ‘नेचुरल’ या ‘विटामिन युक्त’ लिखा होता है, जबकि चीनी, नमक और वसा की जानकारी पीछे छोटे अक्षरों में छिपी रहती है। सामान्य ग्राहक मार्केट में खड़े होकर पोषण तालिका का गणित नहीं करता। इसलिए पैकेट के सामने चेतावनी उपभोक्ता के अधिकार का प्रश्न है। कनाडा में जनवरी 2026 से ऐसे पैकेटबंद खाद्य पदार्थों पर सामने स्पष्ट प्रतीक अनिवार्य हैं, जिनमें संतृप्त वसा, शुगर या सोडियम तय सीमा से अधिक है। चिली, मैक्सिको और कई अन्य देशों ने भी चेतावनी-आधारित मॉडल अपनाए हैं। चिली में 2016 में चेतावनी चिह्न लागू होने के बाद मीठे पेयों की खरीद में गिरावट देखी गई। जब जानकारी साफ और तुरंत समझ आने वाली हो, तो वह व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। लेकिन प्रस्ताव में कमियां भी हैं। पहले चरण में चेतावनी तभी लगाने की बात है जब तीन चिंताजनक पोषक तत्वों में से कम से कम दो निर्धारित सीमा से अधिक हों। इस प्रावधान के साथ समस्या है, जैसे कि अत्यधिक चीनी वाला कोई उत्पाद केवल इसलिए चेतावनी से बच जाए क्योंकि उसमें नमक और वसा कम हैं। सिद्धांत सरल होना चाहिए- यदि चीनी अधिक है तो चीनी की चेतावनी, नमक अधिक है तो नमक की, और संतृप्त वसा अधिक है तो उसकी। चेतावनी इतनी बड़ी और स्पष्ट हो कि खरीदते समय दिखाई दे। यह भी याद रखना होगा कि अभी प्रस्ताव कानून नहीं बना है। भारत में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग पर चर्चा एक दशक से चलती रही है। अनेक मसौदे, समितियां और परामर्श हुए, लेकिन अंतिम निर्णय टलता रहा। ऐसे उपाय अनिश्चितकालीन विचार-विमर्श में नहीं फंसने चाहिए। उद्योग को बदलाव के लिए उचित समय मिले, पर समयसीमा स्पष्ट हो। फिर भी चेतावनी लेबल को बढ़ते मोटापे और अस्वस्थ खान-पान की जादुई दवा समझना गलती होगी। भोजन का चुनाव कीमत, उपलब्धता, विज्ञापन, आदत, परिवार, स्वाद और सामाजिक परिवेश से तय होता है। जिस बच्चे को दिन भर विज्ञापनों में जंक फूड दिखाया जा रहा हो, उसके लिए पैकेट का लाल निशान पर्याप्त नहीं होगा। इसलिए समाधान समग्र होना चाहिए। अस्वस्थ खाद्य विज्ञापनों पर कड़े नियम हों, स्कूलों के आसपास स्वस्थ भोजन उपलब्ध हो, मीठे पेयों और अत्यधिक अस्वस्थ उत्पादों पर कर जैसे उपायों पर विचार हो, कंपनियों को उत्पादों में नमक, चीनी और वसा घटाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और फल, दाल, दूध, मोटे अनाज तथा कम-प्रोसेस्ड भोजन को सुलभ बनाया जाए। पोषण शिक्षा जरूरी है, लेकिन पूरी जिम्मेदारी उपभोक्ता पर डालना अनुचित है। लेबल के साथ ऐसी नीतियां भी चाहिए जो उद्योगों को स्वास्थ्यकर उत्पाद बनाने के लिए प्रेरित करें। फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी न तो खाद्य उद्योग के खिलाफ अभियान है, न यह तय करती है कि कोई खाद्य पदार्थ कभी खाया ही न जाए। इसका उद्देश्य इतना है कि खरीद का फैसला भ्रम या चमकदार विज्ञापन के बजाय स्पष्ट जानकारी के साथ हो। इसलिए हमें दो अतियों से बचना चाहिए- यह कहना कि लेबल सब बदल देगा और क्योंकि वह सब नहीं बदल सकता, इसलिए उसकी जरूरत नहीं। सार्वजनिक स्वास्थ्य में अकसर परिणाम किसी एक बड़े कदम से नहीं, बल्कि कई छोटे और सही कदमों के साथ आने से बनते हैं। भारत को इसे स्पष्ट, मजबूत और शीघ्र लागू करना चाहिए। साथ ही समझना चाहिए कि स्वस्थ भारत केवल बेहतर लेबल से नहीं, बेहतर खाद्य व्यवस्था से बनेगा। भारत में फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग पर चर्चा एक दशक से चलती रही है। अनेक मसौदे, समितियां व परामर्श हुए, लेकिन अंतिम निर्णय टलता रहा। सार्वजनिक स्वास्थ्य के ऐसे उपाय अनिश्चितकालीन विचार-विमर्श में नहीं फंसने चाहिए। (ये लेखक के अपने विचार हैं)