एन. रघुरामन का कॉलम:जब जिंदगी बेरहम हो तो डिसीजन-मेकर्स को राहत देनी चाहिए, तकलीफ नहीं
कभी-कभी ऐसे पल आते हैं, जब किसी खबर पर आप ठिठक जाते हैं। नजरें उठाकर सोचने लगते हैं कि हमने कैसी दुनिया बना ली है। मुंबई की ओवर-क्राउडेड लोकल ट्रेन से गिरकर जान गंवाने वाले 19 साल के एक श्रमिक की स्टोरी भी ऐसा ही पल थी। इसके बाद उसके पैरेंट्स के साथ जो हुआ, वह इस त्रासदी को ज्यादा दर्दनाक बनाता है। 1 सितंबर 2015 को रात 8 बजे बाद संदीप पांडा (19) नवी मुंबई में बेलापुर से मुंबई के सीएसएमटी जा रहे थे। ट्रेन खचाखच भरी थी और संदीप को दरवाजे के पास खड़े होने की जगह मिल पाई थी। रास्ते में पड़ने वाले कुर्ला और चूनाभट्टी स्टेशनों के बीच वो गिर गए। उन्हें सायन अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। इस हादसे को समझने के लिए हमें यह जानना भी जरूरी है कि उसी दिन सुबह वह कुर्ला से बेलापुर गए थे। इसके बाद संदीप के पैरेंट्स, भास्कर (52) और प्रफुल्ला (48) ने रेलवे से मुआवजे की मांग की। हैरानी की बात यह थी कि ट्रिब्यूनल ने उनका दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि संदीप के शव से कुर्ला-बेलापुर का टिकट तो मिला, लेकिन बेलापुर-सीएसएमटी का नहीं मिला। चूंकि हादसा दूसरी यात्रा के दौरान हुआ था, इसलिए संदीप को वैध यात्री नहीं माना जा सकता। पैरेंट्स ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने दलील दी कि संदीप ने टिकट खरीदा था, लेकिन पेश नहीं कर सका। रेलवे ने संदीप के कुर्ला से ट्रेन में चढ़ने के निर्णय पर भी सवाल उठाया, जबकि उसका परिवार तो चेम्बूर में रहता है- जो उसके गंतव्य बेलापुर से नजदीक था। रेलवे ने इस बात पर जोर दिया कि वापसी की यात्रा का टिकट नहीं मिला, इसलिए उसे दावा खारिज करने का अधिकार था। रेलवे ने परिवार की बात को ‘मनगढ़ंत, निरर्थक और फर्जी’ तक बता दिया। कोई नहीं जानता कि जवान बेटे को खो देने की घटना कैसे ‘मनगढ़ंत, निरर्थक और फर्जी’ बताई जा सकती है। पैरेंट्स को शव से बरामद टिकट दिखाया गया, जो उस यात्रा का नहीं था, जिसमें संदीप ट्रेन से गिरा था। बेटे को खोने वाले उन पैरेंट्स की पीड़ा की कल्पना कीजिए, जिनसे कहा गया हो कि दस्तावेज और दलीलों से साबित करो कि वह कानून के तहत सुरक्षा का अधिकार रखता था। सौभाग्य से, बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस साठे ने इस हफ्ते ट्रिब्यूनल की दलील खारिज कर दी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का सहारा लिया, जो कहता है कि सिर्फ रेलवे टिकट न मिलने से किसी व्यक्ति के वैध यात्री होने के दर्जे को नहीं नकारा जा सकता। जज ने ट्रिब्यूनल का फैसला रद्द कर रेलवे को संदीप के पैरेंट्स को 8 लाख रुपए मुआवजा देने के निर्देश दिए। अदालत ने जांच की कमियों की भी आलोचना की और कहा कि ट्रिब्यूनल ने रेलवे एक्ट की ‘संकीर्ण और गलत’ व्याख्या की। शुक्र है कि बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस अन्याय को सुधारा। लेकिन कितने आम परिवारों के पास ऐसी लड़ाइयां लड़ने की ताकत, पैसा, समय और कानूनी मदद होती है? ऐसे हादसों के रूप में जीवन बेरहम हो सकता है, लेकिन संस्थाओं को उदासीनता दिखा कर इस बेरहमी को और नहीं बढ़ाना चाहिए। कोई मिसिंग टिकट किसी जिंदगी को नहीं मिटा सकता। कोई मिसिंग डॉक्यूमेंट किसी सच्ची त्रासदी को नहीं झुठला सकता। नियम जरूरी हैं, लेकिन उनका मकसद न्याय देना होना चाहिए, न कि न्याय से इनकार करने का आसान बहाना देना। इस मामले में यह बताने वाले गवाह थे कि संदीप जब गिरा, तब वह ट्रेन में यात्रा कर रहा था। यह घटना हमें एक असहज करने वाली सच्चाई भी याद दिलाती है : अकसर जब कुछ गलत होता है, तभी हमें पता चलता है कि हम कितने कमजोर हैं। जब किसी को कोई नुकसान होता है तो हमें जल्दबाजी में उसे इस आधार पर जज नहीं करना चाहिए कि उसने क्या नहीं किया। बल्कि, हमें पूछना चाहिए कि आखिर हुआ क्या था। उसकी परिस्थितियों को सुनना चाहिए। सही समय पर थोड़ी-सी करुणा भी असहनीय स्थिति को सहना थोड़ा आसान बना सकती है। फंडा यह है कि जिंदगी कभी कुछ लोगों के साथ बेरहमी कर सकती है। लेकिन फैसले लेने वाली कुर्सियों पर बैठे अधिकारियों को अपनी उदासीनता से उनकी जिंदगी और बेरहम नहीं बनानी चाहिए।