प्रो. मनोज कुमार झा का कॉलम:भारत के विचार को हमारे राष्ट्र-नायकों ने मिलजुलकर गढ़ा था
तीन दशक से भी अधिक समय से मैं कभी-कभी एक अजीब प्रश्न की ओर लौटता रहा हूं। अगर मेरा जन्म 1920 के दशक के भारत में हुआ होता, तो क्या होता? अगर मेरी किशोरावस्था स्वतंत्रता संघर्ष के अंतिम, उथल-पुथल भरे दशकों के बीच बीती होती, तो मैंने क्या देखा होता, क्या सुना होता और क्या माना होता? क्या मुझे उस ऐतिहासिक क्षण की विराटता का एहसास होता, जिसमें मैं जी रहा था? मैं यह सवाल किसी अतीत-मोह के कारण नहीं पूछता। अगर मेरा जन्म 1920 के दशक में हुआ होता, तो मेरा बचपन एक साम्राज्य की छाया में बीतता और मेरी किशोरावस्था उस भारत के साथ आगे बढ़ती, जो अपनी राजनीतिक आवाज खोज रहा था। 1930 और 1940 के दशक तक राजनीति रोजमर्रा की जिंदगी में प्रवेश कर चुकी थी। बाजारों में गिरफ्तारियों की खबरें और अफवाहें होतीं, रेलवे स्टेशनों पर सभाओं और प्रदर्शनों में जाने वालों की भीड़ दिखाई देती। कस्बों और गांवों में स्वराज, सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा जैसे शब्द सामान्य बातचीत का हिस्सा बन चुके होते। विश्वविद्यालय केवल पढ़ाई की जगह नहीं होते; वे राजनीतिक कल्पना की प्रयोगशालाएं बन रहे होते। स्वतंत्रता संघर्ष केवल विदेशी शासन को हटाकर उसकी जगह भारतीय शासकों को बैठाने की लड़ाई नहीं था। उसके भीतर एक बहुत बड़ा सवाल छिपा था कि इतने विविध, असमान और श्रेणीबद्ध समाज में स्वतंत्रता का अर्थ क्या होगा? नागरिकता क्या होगी? क्या लोकतंत्र असहमति और विविधता को अपने भीतर जगह दे सकेगा? क्या राजनीतिक स्वतंत्रता सामाजिक असमानता के साथ सह-अस्तित्व में रह सकती है? अगर मैं उस समय का युवा होता, तो शायद इन सवालों से मेरा किसी किताब नहीं, बल्कि जीवन में सामना होता। राजनीति मेरे लिए कोई अकादमिक विषय नहीं होती; वह मेरा जीवन-अनुभव होती। और फिर गांधी होते। उन वर्षों में महात्मा गांधी का सामना केवल एक राजनेता से मिलना नहीं होता। यह राजनीति में नैतिकता को उतारने के एक असाधारण प्रयोग को अपनी आंखों के सामने देखना होता। कल्पना करता हूं कि शायद मैं भी मीलों चलकर गांधी की किसी प्रार्थना सभा में पहुंचा होता। गांवों से आए लोगों, मजदूरों, छात्रों के बीच बैठकर उन्हें सत्याग्रह, अनुशासन, अहिंसा, सद्भाव की बात करते सुनता। फिर नेहरू भी होते- भविष्य की कल्पनाएं करने वाले। सोचिए कि मैं इलाहाबाद या लाहौर में कोई छात्र होता और नेहरू को विज्ञान, औद्योगीकरण, लोकतंत्र, और आधुनिक विश्व में भारत की भूमिका पर बोलते सुनता। वे शायद मुझे यह समझाते कि स्वतंत्रता मंजिल नहीं, एक शुरुआत है। नेहरू का बड़ा आग्रह था कि आजाद भारत को लोकतांत्रिक संस्थाएं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शिक्षा, आर्थिक नियोजन और लोकतांत्रिक आदतें विकसित करनी होंगी। फिर पटेल होते, जिनका राजनीतिक पाठ कुछ अलग था। वे बताते कि आंदोलन केवल प्रेरणा से नहीं चलते। उनके लिए संगठन चाहिए, अनुशासन चाहिए, बातचीत और समझौते की क्षमता चाहिए और राजनीतिक भावना को सामूहिक कार्रवाई में बदलने की असाधारण योग्यता भी चाहिए। और फिर, शायद सबसे बेचैन कर देने वाला सामना डॉ. भीमराव आंबेडकर से होता। आंबेडकर से मिलना किसी भी युवा राष्ट्रवादी की सहज धारणाओं को झकझोर सकता था। जिस समय राष्ट्रीय स्वतंत्रता का विचार लोगों को रोमांचित कर रहा था, आंबेडकर एक असुविधाजनक सवाल पूछ रहे थे- स्वतंत्रता किसके लिए? इसी के साथ मौलाना अबुल कलाम आजाद भी होते, जिनकी भारत की कल्पना बढ़ती हुई सांप्रदायिक राजनीति के सामने एक अलग रास्ता प्रस्तुत करती थी। उनका साझा राष्ट्रवाद इस विश्वास पर आधारित था कि भारत की विविधता कोई समस्या नहीं, बल्कि उसकी सभ्यतागत वास्तविकता है। गांधी, नेहरू, पटेल, आंबेडकर, आजाद एक तरह नहीं सोचते थे। उनके मतभेद वास्तविक थे। उनकी प्राथमिकताएं कई बार टकराती थीं। लेकिन शायद यही स्वतंत्रता संघर्ष की सबसे बड़ी शक्ति थी। भारत किसी तैयार विचार के रूप में अपने नागरिकों को नहीं सौंपा गया था। भारत पर बहस हुई थी, उस पर असहमति हुई थी और उसी बहस के भीतर भारत की कल्पना आकार लेती गई थी। इतिहास अपने समय में कभी इतिहास जैसा दिखाई नहीं देता। उस समय जो लोग जेल गए या आंदोलन में शामिल हुए, वे नहीं जानते थे आने वाली पीढ़ियां उन्हें किस तरह याद करेंगी। वे इतिहास की किसी किताब के अध्याय में नहीं, अपने वर्तमान में जी रहे थे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)