माइकल ब्लूमबर्ग का कॉलम:दुनिया के शहर मिलकर भी क्लाइमेट चेंज से लड़ सकते हैं
जलवायु परिवर्तन के खिलाफ पूरी दुनिया ही एक लड़ाई लड़ रही है। इस संघर्ष में लक्ष्यों और प्रतिबद्धताओं की कोई कमी नहीं रही है। लेकिन अंततः लोग इस दिशा में हुई प्रगति का आकलन इस आधार पर करते हैं कि वे अपने दैनिक जीवन में क्या अनुभव करते हैं। और जलवायु कार्रवाई का प्रभाव दुनिया के शहरों में सबसे अधिक प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है। शहरों में यह समझ अब बनने लगी है कि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने और जलवायु संबंधी चुनौतियों का सामना करने की क्षमता बढ़ाने वाले उपाय लोगों के दैनिक जीवन को भी बेहतर बनाते हैं। एनर्जी-इफिशिएंट घर बिजली के बिल को कम करते हैं। रिन्यूएबल एनर्जी आयातित-ईंधनों पर निर्भरता और तेल-गैस की कीमतों में उछाल से पैदा होने वाली मुश्किलों को कम करती है। बेहतर सार्वजनिक परिवहन और सुरक्षित साइकिल इंफ्रास्ट्रक्चर लोगों को आने-जाने के लिए अधिक किफायती और स्वस्थ विकल्प उपलब्ध कराता है। पेड़ और ग्रीन बेल्ट हवा की गुणवत्ता में सुधार लाते हैं, इलाकों को ठंडा रखते हैं और शहरों को रहने के लिए अधिक सुखद बनाते हैं। लेकिन जलवायु कार्रवाई का उद्देश्य केवल यही नहीं है। यह लोगों को गर्म होती पृथ्वी के पहले से स्पष्ट हो चुके प्रभावों से सुरक्षित रखने का भी प्रयास है। लू, बाढ़, सूखा और एक्स्ट्रीम-मौसम की घटनाएं लगातार अधिक तीव्र हो रही हैं। शहर और उनके निवासी इन चुनौतियों का सबसे पहले सामना कर रहे हैं। यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए एडाप्टेशन के उपायों को भी आगे बढ़ाना होगा। दुनिया भर में स्थानीय नेतृत्व स्कूलों, अस्पतालों, नर्सिंग होम्स और सार्वजनिक स्थलों को अत्यधिक गर्मी तथा अन्य जलवायु जोखिमों से नागरिकों की सुरक्षा के लिए अनुकूल बनाने के प्रयास कर रहा है। छायादार व्यवस्थाएं, ग्रीन रूफ और प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम्स बढ़ते तापमान के प्रति शहरों की क्षमता को बढ़ा सकते हैं, जिसका सबसे अधिक लाभ बच्चों, बुजुर्गों और अन्य संवेदनशील समूहों को मिलता है। आज दुनिया के कई बड़े शहरों में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटा है, जबकि उनकी आबादी लगातार बढ़ती रही है। इसके अलावा, तमाम तरह के शहर मिलकर उस प्रगति को और तेज करने के लिए सहयोग कर रहे हैं, जो उन्होंने अलग-अलग स्तर पर हासिल की है। पिछले एक दशक में ग्लोबल कोवेनेंट ऑफ मेयर्स फॉर क्लाइमेट एंड एनर्जी (जीसीओएम) 150 देशों के 14,000 से अधिक शहरों और स्थानीय सरकारों के गठबंधन के रूप में विकसित हुआ है, जो एक अरब से अधिक लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें भारत के भी 29 शहर शामिल हैं और सबसे नया सदस्य तिरुवनंतपुरम है। इसके अनेक सदस्य शहरों ने अपनी सरकारों की तुलना में अधिक महत्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्य अपनाए हैं और उन्हें अधिक तेजी से हासिल करने की दिशा में आगे बढ़े हैं। फिर भी, यदि उन्हें अधिक सहयोग मिले तो वे और तेजी से तथा अधिक व्यापक स्तर पर काम कर सकते हैं। उन्हें तकनीकी विशेषज्ञता और फंडिंग तक पहुंच की तत्काल आवश्यकता है। अनेक स्थानीय निकायों के पास अब भी इतने संसाधन नहीं हैं कि वे जलवायु परियोजनाओं की पहचान, विकास और क्रियान्वयन कर सकें। साझेदारी से इन जरूरतों को पूरा किया जा सकता है। सिटी क्लाइमेट फाइनेंस गैप फंड- जिसे जीसीओएम और विश्व बैंक का समर्थन प्राप्त है- पहले ही ऐसी परियोजनाएं विकसित करने में शहरों को सहायता दे रहा है, जो निवेश को आकर्षित कर सकें और आबादी को लाभ पहुंचा सकें। पिछले कुछ वर्षों में इसने 1,400 से अधिक शहरों को जलवायु संबंधी महत्वाकांक्षाओं को व्यावहारिक कार्रवाई में बदलने में सहायता प्रदान की है। राष्ट्रीय सरकारें अब जलवायु परिवर्तन से निपटने में शहरों की क्षमता को तेजी से स्वीकार कर रही हैं। लेकिन इसे केवल शुरुआत माना जाना चाहिए। सबसे सफल जलवायु-नीतियां वही होती हैं, जिनका असर लोग अपने रोजमर्रा के जीवन में देख और महसूस कर सकें, यानी स्वच्छ हवा, अधिक सुरक्षित सड़कें, बिजली का कम बिल, अधिक स्वस्थ घर और एक्स्ट्रीम-मौसम से बेहतर सुरक्षा। सबसे सफल जलवायु-नीतियां वही होती हैं, जिनका असर लोग अपने रोजमर्रा के जीवन में देख और महसूस कर सकें, यानी स्वच्छ हवा, अधिक सुरक्षित सड़कें, बिजली का कम बिल, अधिक स्वस्थ घर और एक्स्ट्रीम-मौसम से बेहतर सुरक्षा।
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