मेघना पंत का कॉलम:विवाह दो वयस्कों की साझेदारी है, इस बात को हमें समझना होगा
किसी विवाहित पुरुष की मृत्यु होते ही चंद घंटों में इंटरनेट पर बहीखाते खुल जाते हैं। वह कितनी एलिमनी दे रहा था? क्या उसकी पत्नी जरूरत से ज्यादा मांग रही थी? क्या तलाक ने उसे आर्थिक रूप से बर्बाद कर दिया? दूसरी ओर, किसी विवाहिता की मौत पर हम अचानक फोरेंसिक इकोनॉमिस्ट बन जाते हैं। उसके परिवार ने कितना दहेज दिया था? पति की क्या मांग थी? उसके पैरेंट्स ने उसकी उचित सुरक्षा क्यों नहीं की?लेकिन हम शायद ही कभी पूछते हैं कि वो कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो इतनी पीड़ाएं रचती हैं? भारत में विवाह को अब भी दो स्वतंत्र, बालिग लोगों का संबंध कम और परिवारों, समुदायों, बैंक खातों, रसोईघरों, उपनामों के सामाजिक अनुबंध की तरह ज्यादा देखा जाता है। हम विवाह नहीं करते, अपेक्षाओं से बंधते हैं। महिला से अपेक्षा की जाती है कि वह सामंजस्य बिठाए। पुरुष से उम्मीद की जाती है कि वह परिवार का खर्च उठाए। दोनों को साबित करना होता है कि वे अच्छे पति-पत्नी हैं। घर-गृहस्थी में महिला के श्रम को प्रेम, पुरुष के आर्थिक योगदान को उसकी जिम्मेदारी माना जाता है। महिला के त्याग को तब तक अनदेखा किया जाता है, जब तक वह इसके लिए मुआवजा न मांग ले। पुरुष पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को इस बात का सबूत बना दिया जाता है कि महिलाएं लालची होती हैं। यदि कोई महिला 15 साल तक बच्चों की परवरिश करती है, घर सम्भालती है, पति के कॅरिअर के लिए एक शहर से दूसरे शहर जाकर बसती है, उसके पैरेंट्स की देखभाल करती है और अपने पेशेवर जीवन के अवसरों को कुर्बान करती है तो शादी टूटने की स्थिति में उसके इस त्याग और निष्ठा का क्या होगा? शादी की तस्वीरें दीवारों से उतरते ही क्या उसका यह योगदान मूल्यहीन नहीं हो जाता? इसी तरह पुरुष को विश्वास दिलाया जाता है कि उसकी पहचान ही उसके कमाने, परिवार पालने और घर के आर्थिक मामलों पर नियंत्रण रखने से बनती है। ऐसे में तब क्या होता है, जब तलाक उसकी इस पहचान को तोड़ देता है? उसे लग सकता है कि उसे आर्थिक रूप से दंडित, भावनात्मक रूप से अपमानित और सामाजिक रूप से एकाकी छोड़ दिया गया है। ये दोनों ही बातें सच हो सकती हैं, लेकिन किसी भी एक हकीकत को स्वीकारने के लिए दूसरी को खारिज करना जरूरी नहीं। सबसे सुविधाजनक कहानी हमेशा वह होती है, जिसमें किसी एक को विलेन बता दिया जाए। लालची पत्नी, निर्दयी पति, दहेज के भूखे ससुराल वाले : क्योंकि किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराना पूरी व्यवस्था की खामियों को समझने से ज्यादा सरल है। भारत में विवाह की प्रकृति उससे जुड़ी संस्थाओं से कहीं ज्यादा तेजी से बदल रही है। आज महिलाएं कमाती हैं। विरासत का अधिकार रखती हैं। प्रताड़ना भरी शादी से बाहर निकल आती हैं। वहीं पुरुष बच्चों की परवरिश करते हैं, उनकी कस्टडी मांगते हैं। जोड़े पहले बनते हैं, शादी बाद में करते हैं। लोग तलाक पर खुलकर बात कर रहे हैं और पारम्परिक लैंगिक जिम्मेदारियों को नकार रहे हैं। लेकिन हमारी अपेक्षाएं अब भी पुरातन ढर्रे पर हैं। हमें ऐसी आधुनिक महिलाएं चाहिए, जो पत्नी के पारम्परिक कर्तव्य निभाती हों। हमें पुरुष भी आधुनिक चाहिए, पर उनके पास पति के पारम्परिक विशेषाधिकार हों। विवाह भी आधुनिक हों, पर उनमें पुराने जेंडर-आधारित नियम चलते रहें। और जब इन विरोधाभासों का विस्फोट होता है, तो हम उसी व्यक्ति को दोषी ठहराते हैं, जो इस बिखराव के सबसे करीब है। विवाह एक साझेदारी जैसा होना चाहिए। शायद हमारे कानूनों, परिवारों, समुदायों, अपेक्षाओं को भी इसके अनुरूप ढलने की जरूरत है। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)