सैयद अता हसनैन का कॉलम:फ्रांस ही नहीं, आज समूचा यूरोप कई चुनौतियों से रूबरू हो रहा है
लगभग पचास साल पहले जब मैं यूरोपीय इतिहास का अध्ययन कर रहा था तो फ्रांस ने मुझे विशेष रूप से आकर्षित किया था। 1789 की क्रांति ने यूरोप की सीमाओं से बहुत दूर तक राजनीतिक चिंतन को बदल दिया था। दो विश्व युद्धों के दौरान विनाशकारी पराजयों के बावजूद मित्र देशों की मदद से फ्रांस के डटे रहने ने मुझ पर और गहरी छाप छोड़ी। फिर 1968 का साल आया, जब छात्रों और मजदूरों के विरोध प्रदर्शनों ने चार्ल्स द गॉल की सत्ता को हिलाकर रख दिया। हाल ही में मैंने एक समाचार का शीर्षक पढ़ा- "क्या पेरिस जल रहा है?' इसने मुझे 1944 में नाजी ऑकुपेशन से पेरिस की मुक्ति की याद दिला दी। मूलत: यह वाक्य उसी से जुड़ा हुआ है। इतिहास ने बार-बार फ्रांस की परीक्षा ली है। तो क्या आज फिर वैसा ही क्षण है? यह सवाल पेरिस तक सीमित नहीं है। फ्रांस, इटली, पुर्तगाल सहित यूरोप के दूसरे देशों में भी अलग-अलग रूपों में अशांति देखने को मिल रही है। इनमें असंतोष के कारण एक जैसे नहीं हैं और विरोध प्रदर्शन भी लोकतंत्र की सामान्य पहचान है। फिर भी, ये घटनाएं एक बड़ा सवाल खड़ा करती हैं कि क्या यूरोप का राजनीतिक आत्मविश्वास ठीक तब कमजोर पड़ रहा है, जब उसकी रणनीतिक जिम्मेदारियां बढ़ रही हैं? यूरोप आज भी समृद्ध है। वहां उत्कृष्ट विश्वविद्यालय और उद्योग मौजूद हैं। लेकिन किसी राष्ट्र की समृद्धता इस बात की गारंटी नहीं होती कि उसके परिवार आवास का खर्च उठा पाएंगे, वहां सुरक्षित रोजगार उपलब्ध होंगे या बच्चों को बेहतर जीवन मिलेगा। कुछ साल पहले परिवार के साथ पेरिस की यात्रा के दौरान हम यूरोस्टार से गार् दु नॉर्द स्टेशन पहुंचे और वहां से आर्क दे त्रियॉम्फ की ओर पैदल चल पड़े। स्टेशन के आसपास बेघर लोगों और दीवारों पर बने चित्रों का नजारा फ्रांस की सुंदर राजधानी की हमारी कल्पना से बिल्कुल अलग था। हालांकि, किसी एक सैर के आधार पर पूरे शहर को परिभाषित नहीं किया जा सकता, लेकिन यह विरोधाभास मेरे मन में रह गया। आवास की बढ़ती कीमतें और भविष्य की अनिश्चितता यूरोप के अनेक युवाओं को परेशान कर रही हैं। बुजुर्ग होती आबादी को भी कामगारों की जरूरत है। इस बीच, माइग्रेशन ने लोगों को समाज में शामिल करने, सीमा प्रबंधन और स्थानीयजन का भरोसा बनाए रखने जैसे कठिन सवाल खड़े किए हैं। अब ये दबाव वहां की राजनीति को गढ़ रहे हैं, हालांकि अलग-अलग देशों में इनका असर अलग है। यूरोप में बढ़ते असंतोष की व्याख्या किसी एक कारण से नहीं की जा सकती। उसे एक ओर चुनौतीपूर्ण बाहरी परिस्थितियों से जूझना पड़ रहा है, तो दूसरी ओर उसे घरेलू प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बैठाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोपीय रक्षा तैयारियों की कमजोरियों को उजागर किया है। दशकों तक अनेक यूरोपीय सरकारें सुरक्षा की अंतिम गारंटी के तौर पर अमेरिका पर निर्भर रही हैं। अमेरिका आज भी यूरोप की सुरक्षा के लिए अपरिहार्य है, लेकिन उसके बढ़ते सौदेबाजी के रवैये ने इस तर्क को भी बल दिया है कि यूरोप को अपनी सुरक्षा की अधिक जिम्मेदारी खुद के कंधों पर लेनी चाहिए। इसके लिए महज रक्षा बजट बढ़ाने की घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। यूरोप के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करे, लेकिन साथ ही ऐसा करने के लिए किए गए फैसलों से राजनीतिक असंतोष भी न बढ़ने पाए। एक समय था, जब यूरोप की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री, इंजीनियरिंग और उन्नत मैन्युफैक्चरिंग अपराजेय माने जाते थे। लेकिन अब चीनी कंपनियां बड़े पैमाने पर उत्पादन, इनोवेशन और आकर्षक कीमतों के दम पर उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा दे रही हैं। खासकर, इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरियों और रिन्युएबल एनर्जी इक्विपमेंट के क्षेत्र में। भारत के लिए भी इसके महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं। एक मजबूत यूरोप भारत को बाजार, निवेश, टेक्नोलॉजी, रक्षा सहयोग और कूटनीतिक साझेदारी के अवसर देता है। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दौर में यूरोप शक्ति का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी है। हमें ऐसी दुनिया चाहिए, जिसमें कई सक्षम अंतरराष्ट्रीय साझेदार हों, न कि ऐसी दुनिया, जिस पर केवल दो महाशक्तियों का प्रभुत्व हो। क्रांति, आक्रमण, विदेशी कब्जे और राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद फ्रांस डटा हुआ है। विनाशकारी युद्धों के बावजूद यूरोप ने भी स्वयं को फिर से गढ़ा और संस्थाओं का विकास किया है। ऐसे में यूरोप के पतन की अतिरंजित भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)